देहरादून। गढ़वाल मण्डल विकास निगम को इन दिनों अपने कर्मचारियों की तन्ख्वाह देने के भी लाले पड़े हुए हैं। जीएमवीएन को छोटी जरूरतों के लिए शासन का मुंह ताकना पड़ रहा है जबकि निगम अपने ही पैसों के लिए सरकार से कई बार गुहार लगा चुका है लेकिन अभी तक कुछ होता नहीं दिख रहा है।
राज्य बनने के बाद से गढ़वाल मण्डल विकास निगम लगातार बदहाली की तरफ बढ़ रहा है। कभी मुनाफे में चलने वाला निगम के पास आज उसके पास अपने र्कमचारियों की तनख्वाह देने तक के पैसे नहीं है। छोटी-मोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी निगम के पास पैसे नहीं हैं। जीएमवीएन की दिक्कतें खत्म हो सकती हैं अगर करोंड़ों रुपए का बकाया उसे वापस मिल जाए। दरअसल अलग-अलग संस्थाओं और विभागों के पास उसका बकाया है।
सचिवालय, विधानसभा और मुख्यमंत्री आवास में काम कर रहे 66 कर्मचारियों के लगभग 20 करोड़ रुपए निगम को मिलने हैं। मण्डी परिषद पर साल 2015-16 और 2016-17 पर मदिरा के मुनाफे के लगभग 8.50 करोड़ रुपए बकाया हैं।
साल 2013 में आपदा में 70 करोड़ के नुक्सान की प्रतिपूर्ती का शासन से अभी भी इंतजार है। निगम कर्मचारियों का कहना है कि अगर यह बकाया राशि उन्हें मिल जाती है तो जीएमवीएन की माली हालत दुरुस्त हो सकती है। ऐसा नहीं है कि शासन के स्तर पर इसे लेकर कवायद चल रही है। इसकी जानकारी शासन स्तर पर भी है और इसको लेकर बैठकों का दौर भी चल रहा है लेकिन शासन स्तर पर अभी तक किसी तरह की अच्छी खबर आनी बाकी है।
यूपी के समय अपना बसंत देख रहे निगम की हालत राज्य बनने के बाद खस्ता हो गई है और स्थिति ये है कि अब ये अपनी प्रॉपर्टी को सम्पत्ति को पीपीपी मोड में इस्तेमाल करने के लिए दे रहा है।


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