यह विडंबना ही है कि जिस सरदार पटेल ने चीन पर कभी भी यकीन नहीं किया, उनकी मूर्ति ‘स्टैचू ऑफ यूनिटी’ चीन के नानचांग प्रांत में बन रही है. पटेल ने हमेशा जवाहर लाल नेहरू को चीन की पैरोकारी के खिलाफ चेताया. माओ के नेतृत्व में चीन के आक्रामक रवैये के प्रति नेहरू की लगातार उदासीनता के कारण ही 7 नवंबर, 1950 को अपने निधन के महज एक महीने पहले उन्होंने उन्हें आखिरी खत लिखा था, जिसमें उन्होंने चीन के प्रति अपने दृष्टिकोण को पूरी तरह से साफ कर दिया था.
इस गुप्त पत्र में उन्होंने चीन के विस्तारवादी रुख के प्रति नेहरू को खबरदार रहने की सलाह दी थी. हालांकि नेहरू ने शायद इस सलाह का ख्याल नहीं रखा, जिसका ऐतिहासिक खामियाजा उन्हें और पूरे मुल्क को भुगतना पड़ा.
कहा जाता है कि 1962 के भारत-चीन युद्ध में मिली करारी शिकस्त ने नेहरू को इतना तोड़ दिया कि वे इस सदमे से कभी उबर नहीं सके. उनका न सिर्फ प्रभामंडल खत्म हो गया, बल्कि इसके दो साल बाद निधन भी हो गया.
अपने पत्र में पटेल ने नेहरू को लिखा था कि भले ही हम खुद को चीन के मित्र के तौर पर देखते हैं, लेकिन चीन हमें अपना दोस्त नहीं मानता और उसका आक्रामक रवैया हमारे लिए खतरनाक साबित हो सकता है. पटेल ने आगे कहा था कि वामपंथी विचारधारा की यह सोच कि 'जो भी उनके साथ नहीं है, वह उनके खिलाफ है', का अर्थ हमें समय रहते समझना चाहिए. पटेल का यह ऐतिहासिक पत्र भारतीय संविधान कमिटी के सदस्य के.एम.मुंशी द्वारा संकलित भारतीय संविधान के अहम दस्तावेजों का हिस्सा है.
पटेल चीन की तिब्बत नीति के साथ ही अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को लेकर उसके आक्रामक नजरिए के भी खिलाफ थे. 1949 में माओ के नेतृत्व में लाल क्रांति के बाद बनने वाली चीनी सरकार के प्रति नेहरू ने खुलकर दरियादिली दिखाई और हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा दिया.
यहां तक कि नेहरू ने चीन को यूएन की सुरक्षा परिषद में जगह दिलाने की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वकालत की. जबकि अपने इस आखिरी खत में पटेल ने नेहरू को साफ कहा था कि आप भले ही यूएन में चीन की तरफदारी कर रहे हैं, लेकिन उसके रुख को देखकर मुझे शक है चीन कभी आपकी इस तरह से मदद करेगा. बल्कि पटेल ने चीन पर इस अंधविश्वास के खिलाफ भी नेहरू को आगाह किया था.
चीनी कंपनी की ‘फैक्ट्री’ में 3000 करोड़ की यह मूर्ति वर्तमान केंद्र सरकार की मेक इन इंडिया पॉलिसी के भी खिलाफ है. भले ही सरकार ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया है कि यह उस कंपनी का मामला है, जिसने मूर्ति के निर्माण की बोली जीती है, लेकिन कुल मिलाकर मामला तो देश का ही है.
182 फीट ऊंची यह प्रतिमा गुजरात के नर्मदा जिले के साधु बेत में लगने जा रही है. 3000 करोड़ रुपए के इस प्रोजेक्ट का ठेका लार्सन एंड टूब्रो (एलएंडटी) कंपनी को दिया गया है, जिसने चीन की कंपनी टीक्यू आर्ट फाउंड्री को मूर्ति के कांसे के हिस्से को बनाने का ठेका दे रखा है. टीक्यू आर्ट फाउंड्री चीन के नैनचांग में स्थित जियांग्जी टोक्वाइन कंपनी का हिस्सा है.
एलएंडटी को यह ठेका इसलिए चीन की कंपनी को देना पड़ा, क्योंकि इसके लिए काफी बड़ा ढलाई घर चाहिए और भारत में 4600 ढलाईधर तो हैं, लेकिन इनमें कोई भी इतना बड़ा नहीं है, जो इसे बना सके. इसलिए मूर्ति बनाने का काम L&T द्वारा चीन में स्थित विश्व के सबसे बड़े ढलाईघर को दिया गया है.


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