आधा दर्जन से अधिक प्राकृतिक आपदाएं झेली 58 सालों में
उत्तरकाशी। उत्तरकाशी जिले को विकसित होने में भले ही अभी कई वर्षों का इंतजार करना पडेगा। लेकिन 58 सालों में उत्तरकाशी जनपद ने न जाने कितने भीषण बाढ़, भूकंप जैसी दैवी आपदाओं का सामना किया। पिफर भी उत्तरकाशी के वासिंदों का जज्बा कम नहीं हुआ बल्कि डट कर इसका मुकाबला किया और जनपद अविरल विकास के पथ पर आगे बढ़ता रहा है।
जनपद को 24 फरवरी 1960 को टिहरी जिले से अलग हुए आज 58 साल पूरे हो गये हैं। इस क्षेत्र में लगातार आबादी के दबाव के बढ़ने एवं अव्यवस्थित विकास के कारण इनका स्वरूप बिगड़ता चला गया। समय के साथ- साथ संसाधनों का अव्यवस्थित उपयोग होने से समस्याएं विकराल होती चली गयी, जिससे कारण उत्तरकाशी में प्राकृतिक आपदाओं ने कहर ढाया है।
इतिहास गावह हैं 1970 के करीब ला अवाण का पहाड़ टूटने से झाला गाॅव के पास 15 किमी लम्बी झील बनी थी यह झील हर्षिल से आगे जांगला तक बनी थी जिससे 240 मन्दिर, होटल आदि भागीरथी में समा गये थे। बताया जाता है कि उस समय यहां से मात्र 12 लोगों को बचाया गया था तथा भागीरथी में भारी भू-धसाव ने यहां का सारा भूगोराल बदल कर रख दिया। तब उत्तरकाशी नगर में विश्नाथ मंदिर के दायीं और बहने वाली भागीरथी नदी की धारा ने अपना रूख बदल दिया था और यह मंदिर के बांयी तरफ बहने लगी। 1966 में लोहारीनाग पाला के काला पहाड़ के टूटने से भागीरथी का प्रवाह रूक गया था, जिसमें तीर्थ यात्रियों बनी चट्टी समेत मंदिर भी डूब गये, तो 1978 को भागीरथी की प्रलयकारी बाढ़ ने इस़क्षेत्र की तस्वीर ही बदल कर रख दी थी। इस घटना से गंगोत्री यात्रा दो वर्ष तक बंद रही । 1983 में गंगोत्री राजमार्ग पर लेमचा गाड़ में हुए भूस्खलन की चपेट में आने से हर्षिल से उत्तरकाशी की ओर लौट रहे तत्कालीन डीएम गोपाल दास तथा उनकी पत्नी तो किसी तरह बच निकलीे ,लेकिन उनके साथ 6 अधिकारी व कर्मचारी मलबे में दपफन हो गये। 1991 में उत्तरकाशी में विनाशकारी भूकम्प आया जिसमें हजारों लोग मर गये थे। वर्ष 1994 में लोहारीनाग के पास झील बनी तो 24 सितम्बर 2003 को गंगोत्री राजमार्ग नगर से लगा वरूणावत पर्वत से भूस्खलन शुरू हुआ । बिना बारिश के अनवरत रूप से करीब एक माह तक चले इस भूस्खलन में उत्तरकाशी शहर के 221 भवन प्रभावित हुए जिस में 19 सरकारी भवनों के अलावा 202 निजी भवनों में निवास कर रहे करीब 365 परिवरों को दूसरे स्थान पर जाना पडा । 3 अगस्त 2012 रात्रि को जब लोग साढ़े नौ बजे रात्रि बिजली न होन के कारण सोने की तैयारी कर रहे तब अस्सी गंगा एवं भागीरथी में भीषण बाढ़ आई जिससे 50 आदमी मर गये ओर कई दर्जन लोग वेघर हो गये तो 14 मोटर पुल भी बह गये । इस आपदा से शासन-प्रशासन कि कमर पहले ही टूटी थी कि 16-17 जून 2013 को भागीरथी में जब तांडव शुरू हो गया जिससे गंगोत्री से धरासू तक गंगोत्री राज मार्ग 10 स्थानों ने कई मिलो टूट गया तथा गंगोत्री धाम में साढ़े तीन हजार यात्री पफंस गये जिन्हें 12 दिन के सैना द्वारा चला ये गये रेस्क्यू आॅपरेशन के बाद सुरक्षित निकाला जासका तथा डिडसारी, मांड, तिलोथ, जोजिशयाडा में सैकडों मकान एवं होटल भागीरथी में समा गाये थे।


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