उत्तराखंड में अतिसंवेदनशील गांवों में रहने को मजबूर ग्रामीणों के प्रति प्रदेश की सरकारें कितनी संवेदनशील हैं, इसकी बानगी साफ दिख रही है. चार दशक से ऊपर का समय गुजर चुका है मगर सरकार रुद्रप्रयाग जिले के 24 गांवों के 472 परिवारों को विस्थापन नहीं कर पाई है. इन गांवों के सैकड़ों परिवार हर समय मौत के साये में जीने को मजबूर हैं.

रुद्रप्रयाग जनपद के छांतीखाल, पांजणा और रैल गांव के विस्थापन के मसले को दशकों बीत चुके हैं, मगर आज भी यहां के ग्रामीण आस लगाये हैं कि सरकार कभी तो अपनी नींद से जागेगी और उन्हें सुरक्षित स्थानों पर पहंचाएगी

इन गावों के साथ ही 21 अन्य गांव भी ऐसे हैं जो कि विस्थापन की जद में हैं. सरकार को इनकी रिपोर्ट्स भी वर्षों पूर्व जा चुकी हैं. छांतीखाल गांव बहुचर्चित सिरोबगड स्लाइड के ठीक उपर बसा है. यहां से अधिकांश परिवार खुद विस्थापित हो चुके हैं, मगर आठ परिवार आज भी आर्थिक संसाधनों के अभाव में ऐसे हैं जो सरकार की राह तांक रहे हैं.

ग्राम सभा के पूर्व प्रधान नरेन्द्र मंमगाई का कहना है कि सड़क मार्ग को खतरा समझते हुए सरकार ने तो यहां पर बाईपास मोटर मार्ग का निर्माण प्रस्तावित कर दिया है. मगर इन आठ परिवारों के बारे में सोचने के लिए लगता है सरकार के पास समय ही नहीं है.जिलाधिकारी की मानें तो वे पहले ही शासन को प्रस्ताव भेज जा चुके हैं. अब फिर से सर्वे करवाकर रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी.
तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार में तो ग्रामीण अंचलों की आवाज लखनऊ तक नहीं पहुंच पाती थी, मगर राज्य बनने के बाद भी यही लग रहा है कि देहरादून में भी सरकार तक ग्रामीणों का दर्द नहीं पहुंच पा रहा है. ऐसे में साफ है कि इन 24 गांवों के 427 परिवारों के उपर जब कोई बड़ा संकट आयेगा तब ही सरकार संवेदना जताने इन गांवों में पहुंच पाएगी.

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