परमार्थ गंगा तट पर विदेशी भक्तों ने ध्यान की गहन विधाओं को किया आत्मसात
परमशान्ति से युक्त जीवन ही धन्य जीवन-
परमार्थ में उत्तर और दक्षिण, पूर्व और पश्चिम का संगम-स्वामी चिदानन्द सरस्वती
पूर्णता, में ही ब्रह्म, जीव और जगत का ज्ञान समाहित- श्री वस्त
ऋषिकेश, 15 मार्च। परमार्थ निकेतन आश्रम में दक्षिण भारत के संत श्री वस्त जी पधारे। उन्होने परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज एवं साध्वी भगवती सरस्वती जी से मुलाकात की। दोनों आध्यात्मिक सन्तों ने भारतीय दर्शन, अध्यात्म, उत्तर भारत व दक्षिण भारत की संस्कृतियों का समन्वय तथा मानव और प्रकृति के बीच के सम्बंधों के विषयों पर विस्तृत चर्चा की।
संत श्री वस्त जी ने परमार्थ निकेतन माँ गंगा के तट पर लौकिक जीवन को पहचानने; मानव जीवन के अस्तित्व की उच्चतम क्षमताओं का पता लगाने; जीवन के जश्न के साथ मुक्ति के मार्ग पर बढ़ने एवं ध्यान की उच्चतम विधाओं को आत्मसात करने की विधाओं को सब के साथ साझा किया। उन्होने बताया कि जीवन को किसी भी पीड़ा से परे अनुभव किया जा सकता है। साथ ही उन्होने प्रकृति एवं पारिस्थितिक तरीकों के आधार पर जीवन जीने की शिक्षा दी।
पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा, ’भारत माता और गंगा माता जिन्होने सभ्यता, संस्कृति एवं संस्कारों को जन्म दिया है तथा इस राष्ट्र ने पूरे विश्व को वसुधैव कुटुम्बकम का मंत्र दिया; सर्वे भवन्तु सुखिनः की संस्कृति दी है उस राष्ट्र की दो अलग संस्कृतियों का गंगा तट पर एकत्र होना अद्भुत संयोग है। स्वामी जी ने कहा कि पूरब हो या पश्चिम, उत्तर हो या दक्षिण हम सबके बीच मानवता की गंगा सदैव प्रवाहित होती रहे। उन्होने कहा, मनुष्य का जीवन सेवा के लिये है और वर्तमान समय में प्रकृति की सेवा ही सबसे बड़ी सेवा है परन्तु वर्तमान परिदृश्य कुछ और ही है, जीवन में हम जो कमाते है उससे अलमारियों से शेल्फ ही भरते रह जाते हैं लेकिन भारतीय संस्कृति हमें सिखाती है कि हम अपने सेल्फ को; भीतर को भी भरे। बाहर से भरी हुई चीजें बाहर ही रह जाती है लेकिन जब भीतर से व्यक्ति खुद को परम शान्ति से भरना शुरू करता है तो वहीं जीवन धन्य बन जाता है।’
संत श्री वस्त जी ने कहा कि ’हिमालय की तलहटी में गंगा के पावन तट पर स्थित परमार्थ निकेतन साधना के लिये श्रेष्ठ स्थान है। उन्होने कहा कि हम सभी पूर्णता के अंश है अतः पूर्णमय जीवन ही जीये। पूर्णता में ही ब्रह्म, जीव और जगत का ज्ञान समाहित है। भारतीय दर्शन और अध्यात्म पूर्णता का मूल स्रोत है।’
पूज्य स्वामी जी ने श्री वस्त जी को शिवत्व का प्रतीक रूद्राक्ष का पौधा भंट किया। गुरूजी श्री वस्त जी और सभी भक्तों ने परमार्थ गंगा तट पर होने वाली दिव्य आरती में सहभाग किया। भक्त मंत्रमुग्ध होकर आरती का आनन्द लें रहे थे उन्होने कहा कि हम इस दिव्य आरती को लाइव देखते थे आज परम सौभाग्य का दिन है कि हम साक्षात इस आरती के सहभागी है। सैकड़ों की संख्या में साधक गंगा आरती में आन्नदित होकर झुम रहे थे। आरती के पश्चात सभी साधकों ने पूज्य स्वामी जी एवं जीवा की अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती जी के सत्संग में भाग लिया। सभी ने मिलकर विश्व स्तर पर जल की आपूर्ति हेतु वाटर ब्लेसिंग सेरेमनी सम्पन्न की।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने सभी भक्तों को प्रकृति की सेवा का संकल्प कराया।


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