देवभूमि उत्तराखंड की जिस धरती पर जंगलों को बचाने के लिए चिपको जैसे आंदोलनों ने जन्म लिया हो, देवभूमि की जिस धरती पर मैती जैसे आंदोलन खडे हुए हों... उसी धरती पर ऑल वेदर रोड के लिए पचास हज़ार से अधिक पेड़ों को बेदर्दी से काटे जाने ने लोगों को बेचैन कर दिया है. मानकों को ताक पर रखकर हज़ारों-हज़ार टन मलबा नदियों में उडेला जा रहा है. कांग्रेस इसे विकास के नाम पर विनाश को न्यौता देने जैसा बता रही है, तो पर्यावरणविद भी प्रकृति के इस कत्लेआम पर बेहद चिंतित हैं.
उत्तराखंड के चारों धाम गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थित हैं और यह पूरी बेल्ट भू-गर्भीय दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील ज़ोन चार और पांच में आती है. प्रधानमंत्री मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट चारों धामों को टू लेन ऑल वेदर रोड़ से जोड़ने का है. 12 हज़ार करोड़ के इस प्रोजेक्ट के तहत करीब नौ सौ किमी सड़क को टू-लेन मार्ग में बदला जाना है.
इसके लिए 542 किलोमीटर लंबाई में 648 हेक्टेयर वन भूमि का अधिग्रहण कर 44 हजार 776 पेड़ काटे जाने हैं. चार सौ सोलह किलोमीटर लंबाई में अभी तक 33 हज़ार 908 पेड़ काटे जा चुके हैं. लेकिन यह सिर्फ़ सरकारी आंकड़ा है. असलियत में पेड़ों के काटे जाने की संख्या इसके डेढ़ गुना तक हो सकती है.
पर्यावरणविदों का कहना है कि सिर्फ़ पेड़ ही नहीं कटेंगे बल्कि उनके साथ हजारों प्रकार की वनस्पति भी नष्ट होगी. पर्यावरणविद सुरेश भाई कहते हैं कि इससे उच्च हिमालयी क्षेत्र में बडे पैमाने पर जैव विवधिता को खतरा पैदा हो जाएगा.
राज्य में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने भी ऑल वेदर रोड के निर्माण में परंपरागत तरीकों का ही उपयोग किए जाने पर आपत्ति जताई है. कांग्रेस का कहना है कि इससे पहाड़ में बड़ी संख्या में नए भू-स्खलन क्षेत्र विकसित हो सकते हैं. पहाड़ कटान का मलबा डंपिग जोन में डालने के बजाए सीधे नदियों, गाड-गदेरों में डाले जाना भी बरसात में नदियों के रूख को बदल देगा और बाढ़ की स्थित पैदा हो जाएगी.
प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष जोत सिंह बिष्ट कहते हैं कि अपने राजनीतिक फायदे के लिए केंद्र व राज्य सरकारें निर्धारित समय में काम करने के लिए एजेंसियों पर दबाव बना रही हैं और एजेंसियां तमाम मानकों को दरकिनार कर विनाश को न्यौता दे रही हैं.
अब एक बार फिर साल 1974 के चिपको आंदोलन को भी याद कर लेते हैं जब चमोली की धरती पर हजारों की संख्या में पेड़ कटान का काम शुरू हुआ तो सीधी-सादी ग्रामीण महिलाओं ने आंदोलन का बिगुल फूंक दिया. बच्चों की तरह पेड़ों की सुरक्षा की और एक-एक पेड़ पर चिपक कर उन्हें कटने से बचा लिया.
1980 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी झुकना पड़ा और उन्हें प्रदेश के हिमालयी वनों में पंद्रह साल के लिए पेड़ कटान पर रोक लगानी पड़ी. अपने मूल रूप में ये कोई पर्यावरण संरक्षण का आंदोलन नहीं था, ये एक भावनात्मक जुडाव था. प्रकृति से, अपने जल, जंगल और जमीन से. विकास की दरकार तब भी थी आज भी है. दिल्ली में बैठे हुक्मरान को पहाड़ों से यहां के लोगों की परवाह न तब थी न अब है.... हां लोगों की विकास और भावनात्मक ज़रूरतें शायद बदल गई हैं.


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