देहरादून। ज्ञान का आधार वैज्ञानिक होता है और वो रोज मर्रा की जिंदगी की मुश्किलों को ध्यान में रख ईजाद किया जाता है। कुछ ऐसा ही ज्ञान पहाड़ों की परंपराओं में दिखाई देता है, जो कि पहाड़ की मुश्किल जिंदगी में पर्वतनजनों के काम आता रहा है। जबकि इस बात को हाल ही में आई आपदा विभाग की एक रिपोर्ट ने भी माना है।
आपदा विभाग की उत्तराखण्ड डिजास्टर रिस्क मैनेजमेंट रिपोर्ट में इस बात को माना है कि पहड़ों में पुरखों से मिले ज्ञान की बदौलत हमारे पुरखे बड़ी से बड़ी आपदा को मात दे देते थे। 2 साल की मेहनत के बाद वर्ल्ड बैंक की मदद से बनाई गई इस रिपोर्ट में इस बात का जिक्र है। इस रिपोर्ट में कुछ उदाहरण दिए गए हैं जो ये बताते हैं कि पहाड़ों से मिली परंपराओं में विज्ञान छुपा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है उत्तराकाशी की कोटी बनाल वास्तुकला से बनी ईमारतें, जो पिछले एक हजार सालों से आज भी यूं ही खडी हैं। जब आपदा विभाग ने इस कला से बनी ईमारतों की कार्बन डेटिंग की तो पता चला कि यह हजारों साल से कई भूकंप झेलने के बाद अभी भी यूं ही खड़ी हैं। हालांकि ये भवन भूकंप के लिहाज से जोन 4 और 5 में आते हैं। पहाडों में जहां आजकल कहा जाता है कि बहुमंजिला ईमारतें बनाने से खतरे बढ़ जाते हैं, लेकिन हमारे पुरखे तो कई सो सालों से बहुमंजिला ईमारतों में ही रहते आए थे।
आपदा विभाग ने ईमारतों की कार्बन डेटिंग की तो पता चला कि ये हजारों साल से कई भूकंप झेलने के बाद अभी भी यूं ही खड़ी हैं। दरअसल, वास्तु कला से बनी ईमारतें हमारे परंपरागत ज्ञान का नतीजा है, जिसने सदियों से आपदा के दौरान हमारे जोखिम को कम किया। सूखे से निपटने के लिए उस समय चाल खाल बनाए जाते थे, जहां पानी का संरक्षण किया जाता था। हाल ही में आई आपदा विभाग की एक रिपोर्ट में इस बात पर मुहर लगी है। चूंकि पहाड़ों में खेती और पशुपालन पूरी तरह से बरसात पर निर्भर था इसलिए सदियों पहले से ही परंपरागत रुप से पहाड़ों में चाल खाल बारिश के पानी को संजोने के लिए बनाए जाते थे।
पहाडों के परंपरागत ज्ञान ने सूखे जैसी आपदा से होने वाले नुकसान को भी कम किया है। उत्तराखण्ड डिजास्टर रिस्क मैनेजमेंट रिपोर्ट ने माना है कि पारंपरिक ज्ञान ने सदियों से हमारे पुरखों को आपदा से बचाए रखा। स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरटी के सीनियर कंसल्घ्टेंट बताते हैं कि गढ़वाल और कुमाऊं में तीन से चार मंजिला ईमारतें हुआ करती थीं। और मंजिल को स्थानीय भाषा में एक नाम दिया गया था। वहीं, पुराने कारिगरों से जब इन लोगों ने बात की तो उन्होंने बताया कि स्थानीय चकौर पत्थर का इस्तेमाल किया जाता था। बहरहाल, अपने परंपरागत ज्ञान और पुरखों की सीख को नजरअंदाज कर हम वो गलतियां कर रहे हैं जो एक नई आपदा को दावत दे रही हैं. अब ये वक्त है अपनी जड़ों की तरफ लौटने का।

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