वन अधिकारी ने ढूंढा पानी को साफ करने वाला सूक्ष्म जीव
देहरादून। उत्तराखंड वन विभाग के एक अधिकारी ने ऐसा जीव ढूंढ लिया है जो पानी को साफ करने का काम करता है और उसमें आॅक्सीजन की मात्रा को बढ़ाता है। अब इस पर वैज्ञानिक आगे अध्ययन करेंगे और सबके लिए स्वच्छ जल के सपने को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे।
99 बैच के आईएफएस अधिकारी सीसीएफ मनोज चंद्रन दो महीने पहले ही अपने मूल विभाग, वन, में लौटे हैं। दो साल तक वह समाज कल्याण विभाग में अपर सचिव के रूप में काम कर रहे थे लेकिन वहीं काम करते हुए उन्होंने राजाजी नेशनल पार्क में सुसवा नदी के जीवों पर काम करना शुरू कर दिया था। चंद्रन बताते हैं कि करीब एक साल पहले उन्होंने नदी के पानी को लेकर उसमें मौजूद जलीय जंतुओं का अध्ययन शुरू किया था। इसी दौरान उन्हें यह जीव रोटिफर वल्गैरिस दिखा। उन्होंने देखा की यह जीव पानी में मौजूद गंदगी को खाकर साफ कर देता है।
रोटिफर की वल्गैरिस प्रजाति के इस जीव के गंदगी को साफ करने का तरीका भी बहुत निराला है। वह एक खोल में रहता है और खाने की जरूरत पड़ने पर अपने दोनों हाथ बाहर निकालकर उन्हें तेजी से घुमाकर एक भंवर बनाता है जिसमें गंदगी खिंची चली आती है।
सिपर्फ 0.1 मिलीमीटर आकार का यह जलीय जीव इस प्रक्रिया के दौरान न सिर्फ वह गंदगी को खींचकर खाता है बल्कि वातावरण में मौजूद आॅक्सीजन को भी पानी में घोलता जाता है जिससे पानी में आॅक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है।
विज्ञान के छात्र रहे चंद्रन ने इसके बाद इसे बढ़ाने की कोशिशें की जो सफल रही। उन्हें लगता है कि यह जलीय जीव सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में कापफी कारगर हो सकता है क्योंकि जो गंदगी मशीन से साफ नहीं हो सकती उसे खाकर खत्म कर देता है।
चंद्रन यह साफ कर देते हैं कि उन्होंने पहली बार इस जीव को नहीं खोजा है। वह कहते हैं जब शुरुआती अध्ययन के दौरान उन्हें यह जीव दिखा तो उन्होंने इंटरनेट पर रिसर्च की और वहीं से उन्हें पता चला कि यह रोटिफर प्रजाति का जीव है। उन्हें यह भी पता चला कि अब तक हुए शोधों से यह पता चल चुका है कि पानी ज्यादा गंदा होने पर उसमें रोटिफर ज्यादा होते हैं लेकिन कहीं भी इन्हें जल शोधन के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा रहा। चंद्रन कहते हैं कि शुरुआती खोज के बाद अब इस रोटिफर वल्गैरिस का पानी को साफ करने के लिए कैसे इस्तेमाल करना है और यह कितना कारगर हो सकता है इसके लिए अब वैज्ञानिकों को काम करना होगा। इस संबंध में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से वन विभाग की बातचीत हो भी रही है। खास बात यह है कि एग्रीकल्चर से बीएससी और फिर वन सेवा में फाॅरेस्ट्री में एमएससी करने वाले मनोज चंद्रन ने यह अध्ययन समाज कल्याण विभाग में तैनाती के दौरान अपने घर पर ही शुरू किया था। यानि कि रोटिफर वल्गैरिस से उनकी पहली मुलाकात अपने घर में निजी माइक्रोस्कोप में ही हुई थी। उन्हें लगता है कि वन विभाग में आने के बाद अब उनके लिए इस तरह के काम करना कुछ आसान हो जाएगा और वैज्ञानिक संस्थाएं अगर ऐसी खोजों को उनके मुकाम तक ले जाती हैं तो न सिर्फ उत्तराखंड की रिस्पना, बिदांल बल्कि गंगा-यमुना जैसी नदियों को भी निर्मल करने का सपना एक दिन पूरा हो सकता है।
देहरादून। उत्तराखंड वन विभाग के एक अधिकारी ने ऐसा जीव ढूंढ लिया है जो पानी को साफ करने का काम करता है और उसमें आॅक्सीजन की मात्रा को बढ़ाता है। अब इस पर वैज्ञानिक आगे अध्ययन करेंगे और सबके लिए स्वच्छ जल के सपने को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे।
99 बैच के आईएफएस अधिकारी सीसीएफ मनोज चंद्रन दो महीने पहले ही अपने मूल विभाग, वन, में लौटे हैं। दो साल तक वह समाज कल्याण विभाग में अपर सचिव के रूप में काम कर रहे थे लेकिन वहीं काम करते हुए उन्होंने राजाजी नेशनल पार्क में सुसवा नदी के जीवों पर काम करना शुरू कर दिया था। चंद्रन बताते हैं कि करीब एक साल पहले उन्होंने नदी के पानी को लेकर उसमें मौजूद जलीय जंतुओं का अध्ययन शुरू किया था। इसी दौरान उन्हें यह जीव रोटिफर वल्गैरिस दिखा। उन्होंने देखा की यह जीव पानी में मौजूद गंदगी को खाकर साफ कर देता है।
रोटिफर की वल्गैरिस प्रजाति के इस जीव के गंदगी को साफ करने का तरीका भी बहुत निराला है। वह एक खोल में रहता है और खाने की जरूरत पड़ने पर अपने दोनों हाथ बाहर निकालकर उन्हें तेजी से घुमाकर एक भंवर बनाता है जिसमें गंदगी खिंची चली आती है।
सिपर्फ 0.1 मिलीमीटर आकार का यह जलीय जीव इस प्रक्रिया के दौरान न सिर्फ वह गंदगी को खींचकर खाता है बल्कि वातावरण में मौजूद आॅक्सीजन को भी पानी में घोलता जाता है जिससे पानी में आॅक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है।
विज्ञान के छात्र रहे चंद्रन ने इसके बाद इसे बढ़ाने की कोशिशें की जो सफल रही। उन्हें लगता है कि यह जलीय जीव सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में कापफी कारगर हो सकता है क्योंकि जो गंदगी मशीन से साफ नहीं हो सकती उसे खाकर खत्म कर देता है।
चंद्रन यह साफ कर देते हैं कि उन्होंने पहली बार इस जीव को नहीं खोजा है। वह कहते हैं जब शुरुआती अध्ययन के दौरान उन्हें यह जीव दिखा तो उन्होंने इंटरनेट पर रिसर्च की और वहीं से उन्हें पता चला कि यह रोटिफर प्रजाति का जीव है। उन्हें यह भी पता चला कि अब तक हुए शोधों से यह पता चल चुका है कि पानी ज्यादा गंदा होने पर उसमें रोटिफर ज्यादा होते हैं लेकिन कहीं भी इन्हें जल शोधन के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा रहा। चंद्रन कहते हैं कि शुरुआती खोज के बाद अब इस रोटिफर वल्गैरिस का पानी को साफ करने के लिए कैसे इस्तेमाल करना है और यह कितना कारगर हो सकता है इसके लिए अब वैज्ञानिकों को काम करना होगा। इस संबंध में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से वन विभाग की बातचीत हो भी रही है। खास बात यह है कि एग्रीकल्चर से बीएससी और फिर वन सेवा में फाॅरेस्ट्री में एमएससी करने वाले मनोज चंद्रन ने यह अध्ययन समाज कल्याण विभाग में तैनाती के दौरान अपने घर पर ही शुरू किया था। यानि कि रोटिफर वल्गैरिस से उनकी पहली मुलाकात अपने घर में निजी माइक्रोस्कोप में ही हुई थी। उन्हें लगता है कि वन विभाग में आने के बाद अब उनके लिए इस तरह के काम करना कुछ आसान हो जाएगा और वैज्ञानिक संस्थाएं अगर ऐसी खोजों को उनके मुकाम तक ले जाती हैं तो न सिर्फ उत्तराखंड की रिस्पना, बिदांल बल्कि गंगा-यमुना जैसी नदियों को भी निर्मल करने का सपना एक दिन पूरा हो सकता है।


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