देहरादून। गैरसैंण को उत्तराखण्ड की राजधानी बनाने के मामले में प्रदेश की भाजपा सरकार ने जनता के सपनों को तोड़ दिया है । 7 दिसम्बर से 13 दिसम्बर 2017 तक चलने वाला विधानसभा सत्र सरकार ने केवल दो दिन चलाकर खत्म कर दिया । एक हफ्ते सत्र चलाने के निर्णय के बाद अचानक ऐसा क्या हुआ कि उसे मात्र दो दिन में ही समाप्त करना पड़ा? सरकार और विपक्ष के पास इसका कोई जवाब नहीं है। मुख्यमन्त्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने इसका ठिकरा विपक्ष के सिर भी फोड़ते हुए कहा कि विपक्ष के साथी भी सदन का सत्र जल्द खत्म करने के पक्ष में थे। वे खुद एक दिन और सत्र चलाने के पक्ष में थे, लेकिन बिजनेस खत्म हो चुका था और शनिवार को प्रश्न काल सम्भव नहीं था। नेता प्रतिपक्ष डाॅ. इंदिरा ह्दयेश भी एक तरह से सरकार का बचाव करती नजर आई। वह बोली इस मौसम में वहाॅ विधानसभा का सत्र चलाया ही नहीं जाना चाहिए था, फिर भी सरकार को एक दिन और सत्र चलाना चाहिए था। पर वह इसके लिए गम्भीर नहीं थी। दो दिन में सत्र की समाप्तिसे यह सापफ हो गया है। सबसे अजब जवाब तो विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल का था। उन्होंने कहा कि सत्र का विधायी काम खत्म होगया था, इसलिए सत्र खत्म करना पड़ा । पर इस बात का जवाब किसी के पास नहीं था कि जब विधानसभा की कार्य मन्त्रणा समिति ने एक हफ्रते सदन चलाने की मंजूरी दी तो दो दिन में सारे विधायी कार्य कैसे खत्म हो गए? क्या कार्य मन्त्रणा समिति ने हफ्ते दिन सदन चलाने के लिए कोई विस्तृत रुपरेखा तैयार नहीं की थी? क्या यह तय ही नहीं किया गया थाकि एक हफ्ते चलने वाले सदन में किस दिन कौन से विधायी कार्य होंगे? और किन- किन सवालों व मुद्दों पर सदन में बहस होगी ? अगर विधानसभा का सत्र चलाने के लिए इस तरह का रवैया जारी रहा तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक खतरनाक स्थिति होगी। जिस तरह से एक हफ्ते के सदन को दो दिन चलाकर स्थगित कर दिया, उससे तो यह साफ पता चलता है कि सरकार की मंशा केवल अनुपूरक बजट पास कराने की थी। जिसे अब हर सरकार ने हर साल का एक विधायी नियम सा बना लिया है। अनुपूरक बजट आपात स्थिति में पेश किए जाने की परम्परा रही है, जब किन्हीं कारणों से वार्षिक बजट से इतर और खर्च हो गए हों तो उसके लिए बजट की उपलब्धता करवाने के लिए अनुपूरक बजट लाया जाता है, ताकि विकास व दूसरे आवश्यक कार्यों के लिए धन की कोई कमी न रहे। पर पिछले कुछ वर्षों से यह एक अलिखित परम्परा सी बना दी गई है। जब सरकार बजट सत्र से लगभग तीन- चार महीने पहले अनुपूरक बजट लाती हैं और यह इस तरह का बजट होता है जो बिना ज्यादा बहस के ‘आसानी’ से सदन में पास हो जाता है । पिछले कुछ सालों से देखें तो प्रदेश में विधानसभा का शीतसत्र केवल और केवल अनुपूरक बजट को ही पास कराने के लिए आयोजित होता है । सदन में पहले दिन अनुपूरक बजट रखा जाता है और उसके साथ ही कुछ विधेयक भी सदन में रखे जाते हैं। जो विधेयक रखे जाते हैं, वे अधिकाॅशतः संशोधन विधेयक ही होते हैं। जो बिना किसी ज्यादा बहस के पास कर दिए जाते हैं। सदन के दूसरे दिन अनुपूरक बजट को भी बिना ज्यादा बहस व संशोधनों के आराम से पास कर दिया जाता है। इस दौरान कुछ विधायकों के सवालों के जवाब भी सरकार देती है। जैसे अनुपूरक बजट पास होता है और कुछ सवाल- जवाबों के बाद सदन की प्रक्रिया एक तरह से पूरी हो जाती है। इसके बाद विपक्ष के किसी सवाल के जवाब में कथित तौर पर हंगामा होता है और उसी कथित हंगामे के बीच विधानसभा अध्यक्ष सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर देते हैं , सरकार भी विपक्ष के उस सवाल का कोई जवाब नहीं देती , जिस पर कथित तौर पर हंगामा मचता है । कुछ ऐसा ही इस बार भी हुआ। सदन में पहले दिन 7 दिसम्बर को वित्त व संसदीय कार्य मन्त्रीप्रकाश पंत ने 3015 करोड़ का अनुपूरक बजट पेश किया । जो अगले दिन 8 दिसम्बर किसी ज्यादा बहस के आराम से पास हो गया। अनुपूरक बजट पेश करते हुए वित्त मन्त्री प्रकाश पंत ने कहा कि इसमें सरकार की महत्वपूर्ण योजनाओं के लिए धन की व्यवस्था की गई है। आमजन से जुड़ी योजनाओं के लिए बजट कम पड़ रहा था, उनका भी इसमें विशेष ध्यान रखा गया है। दो दिन चले सदन में केवल 9 घंटे 45 मिनट कार्य हुआ। इस दौरान सदन में कुल 12 विधेयक पास हुए। एक विधेयक सदन के पटल पर रखा गया। सत्र के लिए विधायकों की ओेर से कुल 1090 प्रश्न प्राप्त हुए। जिनमें से अल्पसूचित रुप से स्वीकार किए गए केवल 18 प्रश्नों से केवल चार के ही उत्तर दिए गए। इसके अलावा आतारांकित रुप से स्वीकार 160 में से 33 , तारंकित रुप से स्वीकार 832 , उत्तरित 193 , विचाराधीन 40 और अस्वीकार 40 प्रश्न किए गए। शीतसत्र के दौरान सबसे ज्यादा अनिर्णय की स्थिति राज्य की राजधानी को लेकर रही। सत्र शुरु होने से पहले भाजपा - काॅग्रेस में इसको लेकर जमकर वाकयुद्ध हुआ। भाजपा की ओर उसके प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट तो यह तक दावा करते घूम रहे थे कि सत्र के दौरान सरकार राज्य की राजधानी को लेकर कोई न कोई संकल्प अवश्य लाएगी। उनके द्वारा तो यह तक कहा जा रहा था कि गैरसैंण को राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने के बारे में भी कोई अंतिम निर्णय किया जा सकता है । पर इस बारे में दो दिन तक सदन में एक लाइन तक की चर्चा नहीं हुई। अलबत्ता सरकार की ओर से यह बयान जरुर दिया गया कि राज्य की राजधानी को लेकर अभी सरकार के पास विधेयक विचाराधीन नहीं है । भले ही दोनों ही दलों ने राजधानी को लेकर कोई स्पष्ट नीति अभी तक न बनाई हो , लेकिन शीतसत्र के पहले गैरसैंण को लेकर जिस तरह कीचर्चा हो रही थी , उसमें आमजन में यह विश्वासबैठ रहा था कि सरकार गैरसैंण को राजधानी बनाने को लेकर कोई न कोई निर्णय इस सत्र में अवश्य लेगी। पर सरकार व विपक्ष ने मिलकर जनता की सारी आशाओं पर न केवल पानी पफेरा बल्कि उसके साथ एक तरह से धोखा भी किया।जनभावनाओं की राजधानी गैरसैंण को लेकर भाजपा , काॅग्रेस की अब तक की सरकारों का रवैया शर्मनाक रुप से उपेक्षित करने वाला ही रहा है। उत्तराखण्ड का गठन हुए भले ही 17 साल हो गए हों , लेकिन उसकी राजधानी कहाॅ होगी? यह आज तक तय नहीं हो पाया है । अब यह अलग बात है कि यह राज्य इस मामले में एक नए रिकार्ड की ओर बढ़ रहा है। वह रिकार्ड है राज्य के विधान भवनों का। राज्य की राजधानी का निर्धारण भले ही न हुआ हो, पर राज्य में इसके बाद भी दो- दो विधान भवन बन चुके हैं ।
देहरादून। गैरसैंण को उत्तराखण्ड की राजधानी बनाने के मामले में प्रदेश की भाजपा सरकार ने जनता के सपनों को तोड़ दिया है । 7 दिसम्बर से 13 दिसम्बर 2017 तक चलने वाला विधानसभा सत्र सरकार ने केवल दो दिन चलाकर खत्म कर दिया । एक हफ्ते सत्र चलाने के निर्णय के बाद अचानक ऐसा क्या हुआ कि उसे मात्र दो दिन में ही समाप्त करना पड़ा? सरकार और विपक्ष के पास इसका कोई जवाब नहीं है। मुख्यमन्त्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने इसका ठिकरा विपक्ष के सिर भी फोड़ते हुए कहा कि विपक्ष के साथी भी सदन का सत्र जल्द खत्म करने के पक्ष में थे। वे खुद एक दिन और सत्र चलाने के पक्ष में थे, लेकिन बिजनेस खत्म हो चुका था और शनिवार को प्रश्न काल सम्भव नहीं था। नेता प्रतिपक्ष डाॅ. इंदिरा ह्दयेश भी एक तरह से सरकार का बचाव करती नजर आई। वह बोली इस मौसम में वहाॅ विधानसभा का सत्र चलाया ही नहीं जाना चाहिए था, फिर भी सरकार को एक दिन और सत्र चलाना चाहिए था। पर वह इसके लिए गम्भीर नहीं थी। दो दिन में सत्र की समाप्तिसे यह सापफ हो गया है। सबसे अजब जवाब तो विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल का था। उन्होंने कहा कि सत्र का विधायी काम खत्म होगया था, इसलिए सत्र खत्म करना पड़ा । पर इस बात का जवाब किसी के पास नहीं था कि जब विधानसभा की कार्य मन्त्रणा समिति ने एक हफ्रते सदन चलाने की मंजूरी दी तो दो दिन में सारे विधायी कार्य कैसे खत्म हो गए? क्या कार्य मन्त्रणा समिति ने हफ्ते दिन सदन चलाने के लिए कोई विस्तृत रुपरेखा तैयार नहीं की थी? क्या यह तय ही नहीं किया गया थाकि एक हफ्ते चलने वाले सदन में किस दिन कौन से विधायी कार्य होंगे? और किन- किन सवालों व मुद्दों पर सदन में बहस होगी ? अगर विधानसभा का सत्र चलाने के लिए इस तरह का रवैया जारी रहा तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक खतरनाक स्थिति होगी। जिस तरह से एक हफ्ते के सदन को दो दिन चलाकर स्थगित कर दिया, उससे तो यह साफ पता चलता है कि सरकार की मंशा केवल अनुपूरक बजट पास कराने की थी। जिसे अब हर सरकार ने हर साल का एक विधायी नियम सा बना लिया है। अनुपूरक बजट आपात स्थिति में पेश किए जाने की परम्परा रही है, जब किन्हीं कारणों से वार्षिक बजट से इतर और खर्च हो गए हों तो उसके लिए बजट की उपलब्धता करवाने के लिए अनुपूरक बजट लाया जाता है, ताकि विकास व दूसरे आवश्यक कार्यों के लिए धन की कोई कमी न रहे। पर पिछले कुछ वर्षों से यह एक अलिखित परम्परा सी बना दी गई है। जब सरकार बजट सत्र से लगभग तीन- चार महीने पहले अनुपूरक बजट लाती हैं और यह इस तरह का बजट होता है जो बिना ज्यादा बहस के ‘आसानी’ से सदन में पास हो जाता है । पिछले कुछ सालों से देखें तो प्रदेश में विधानसभा का शीतसत्र केवल और केवल अनुपूरक बजट को ही पास कराने के लिए आयोजित होता है । सदन में पहले दिन अनुपूरक बजट रखा जाता है और उसके साथ ही कुछ विधेयक भी सदन में रखे जाते हैं। जो विधेयक रखे जाते हैं, वे अधिकाॅशतः संशोधन विधेयक ही होते हैं। जो बिना किसी ज्यादा बहस के पास कर दिए जाते हैं। सदन के दूसरे दिन अनुपूरक बजट को भी बिना ज्यादा बहस व संशोधनों के आराम से पास कर दिया जाता है। इस दौरान कुछ विधायकों के सवालों के जवाब भी सरकार देती है। जैसे अनुपूरक बजट पास होता है और कुछ सवाल- जवाबों के बाद सदन की प्रक्रिया एक तरह से पूरी हो जाती है। इसके बाद विपक्ष के किसी सवाल के जवाब में कथित तौर पर हंगामा होता है और उसी कथित हंगामे के बीच विधानसभा अध्यक्ष सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर देते हैं , सरकार भी विपक्ष के उस सवाल का कोई जवाब नहीं देती , जिस पर कथित तौर पर हंगामा मचता है । कुछ ऐसा ही इस बार भी हुआ। सदन में पहले दिन 7 दिसम्बर को वित्त व संसदीय कार्य मन्त्रीप्रकाश पंत ने 3015 करोड़ का अनुपूरक बजट पेश किया । जो अगले दिन 8 दिसम्बर किसी ज्यादा बहस के आराम से पास हो गया। अनुपूरक बजट पेश करते हुए वित्त मन्त्री प्रकाश पंत ने कहा कि इसमें सरकार की महत्वपूर्ण योजनाओं के लिए धन की व्यवस्था की गई है। आमजन से जुड़ी योजनाओं के लिए बजट कम पड़ रहा था, उनका भी इसमें विशेष ध्यान रखा गया है। दो दिन चले सदन में केवल 9 घंटे 45 मिनट कार्य हुआ। इस दौरान सदन में कुल 12 विधेयक पास हुए। एक विधेयक सदन के पटल पर रखा गया। सत्र के लिए विधायकों की ओेर से कुल 1090 प्रश्न प्राप्त हुए। जिनमें से अल्पसूचित रुप से स्वीकार किए गए केवल 18 प्रश्नों से केवल चार के ही उत्तर दिए गए। इसके अलावा आतारांकित रुप से स्वीकार 160 में से 33 , तारंकित रुप से स्वीकार 832 , उत्तरित 193 , विचाराधीन 40 और अस्वीकार 40 प्रश्न किए गए। शीतसत्र के दौरान सबसे ज्यादा अनिर्णय की स्थिति राज्य की राजधानी को लेकर रही। सत्र शुरु होने से पहले भाजपा - काॅग्रेस में इसको लेकर जमकर वाकयुद्ध हुआ। भाजपा की ओर उसके प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट तो यह तक दावा करते घूम रहे थे कि सत्र के दौरान सरकार राज्य की राजधानी को लेकर कोई न कोई संकल्प अवश्य लाएगी। उनके द्वारा तो यह तक कहा जा रहा था कि गैरसैंण को राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने के बारे में भी कोई अंतिम निर्णय किया जा सकता है । पर इस बारे में दो दिन तक सदन में एक लाइन तक की चर्चा नहीं हुई। अलबत्ता सरकार की ओर से यह बयान जरुर दिया गया कि राज्य की राजधानी को लेकर अभी सरकार के पास विधेयक विचाराधीन नहीं है । भले ही दोनों ही दलों ने राजधानी को लेकर कोई स्पष्ट नीति अभी तक न बनाई हो , लेकिन शीतसत्र के पहले गैरसैंण को लेकर जिस तरह कीचर्चा हो रही थी , उसमें आमजन में यह विश्वासबैठ रहा था कि सरकार गैरसैंण को राजधानी बनाने को लेकर कोई न कोई निर्णय इस सत्र में अवश्य लेगी। पर सरकार व विपक्ष ने मिलकर जनता की सारी आशाओं पर न केवल पानी पफेरा बल्कि उसके साथ एक तरह से धोखा भी किया।जनभावनाओं की राजधानी गैरसैंण को लेकर भाजपा , काॅग्रेस की अब तक की सरकारों का रवैया शर्मनाक रुप से उपेक्षित करने वाला ही रहा है। उत्तराखण्ड का गठन हुए भले ही 17 साल हो गए हों , लेकिन उसकी राजधानी कहाॅ होगी? यह आज तक तय नहीं हो पाया है । अब यह अलग बात है कि यह राज्य इस मामले में एक नए रिकार्ड की ओर बढ़ रहा है। वह रिकार्ड है राज्य के विधान भवनों का। राज्य की राजधानी का निर्धारण भले ही न हुआ हो, पर राज्य में इसके बाद भी दो- दो विधान भवन बन चुके हैं ।


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