उत्तराखंड में निकाय चुनाव निकट हैं और इसे लेकर राज्य के दोनों प्रमुख दलों बीजेपी और कांग्रेस के बीच खींचतान भी शुरू हो गई है. लेकिन पिछले 17 सालों से बारी-बारी से सत्ता की मलाई खा रहे दोनों ही दल इस बात पर आज भी ख़ामोश हैं कि नगर निकायों और पंचायतों को उनके अधिकार कब मिलेंगे.

साल 1992-93 में संसद ने संविधान संशोधन कर लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई पंचायत और नगर निकाय को मजबूत करने के प्रावधान किए थे.

संविधान में 73वें और 74वें संशोधन के ज़रिए पंचायतों और स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा दिया गया था. इस संशोधन के माध्यम से पंचायतों और स्थानीय निकायों को कई अधिकार दिए गए थे.

इनके दायरे में आने वाले करीब 17 विभागों पर निगमों और पंचायतों का अधिकार होना था लेकिन इन संशोधनों को लागू हुए 25 और राज्य बने 17 साल बीत जाने के बावजूद पंचायतों और नगर निकायों को उनके अधिकार नहीं मिल पाए हैं.
कांग्रेस उपाध्यक्ष सूर्यकांत धस्माना इस स्थिति के लिए नेताओं के अहम् और वर्चस्व खोने के उनके डर को ज़िम्मेदार बताते हैं. वह यह भी स्वीकार करते हैं कि इसके लिए कांग्रेस के नेता भी ज़िम्मेदार हैं.

त्रिवेंद्र सरकार के प्रवक्ता और कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक कहते हैं कि सरकार इस दिशा में काम करने जा रही है. जल्द ही इन अधिकारों के हस्तांतरण के लिए एक ड्राफ्ट तैयार किया जाएगा और जल्द से जल्द स्थानीय निकायों को उनके पूरे अधिकार दे दिए जाएंगे.

धर्मपुर के विधायक और देहरादून के मेयर विनोद चमोली वादा करते हैं कि स्थानीय निकाय चुनावों के तुरंत बाद सत्ता के विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी. हालांकि वह इस बात का जवाब नहीं देते कि यह प्रक्रिया पूरी कब तक होगी?

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