उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार का एक साल पूरा हो गया है. कांग्रेस को हराकर सत्ता पर काबिज होने वाली भाजपा के चुनावी मेनिफेस्टो के पन्ने पलटें तो अल्पसंख्यकों के लिए कुछ वादे तो ज़रूर नज़र आएंगे लेकिन क्या इस एक साल  में सरकार मेनिफेस्टो के मुताबिक अल्पसंख्यकों के लिए कितनी कामयाब हो पाई है?

त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अल्पसंख्यक मामलों के लिए एक सीनियर मंत्री को महकमे की ज़िम्मेदारी दी. सूबे की तकरीबन सोलह फीसद अल्पसंख्यक आबादी की तरक्की के लिए एक साल के दौरान भाजपा सरकार ने कुछ नई योजनाएं शुरू कीं तो वहीं पुरानी सरकार की स्कीमों को बरकरार रखा.

ऑनलाइन स्कॉलरशिप और मदरसा बोर्ड में तब्दीलियां जहां एक साल की अहम् उपलब्धियां मानी जा सकती हैं तो वक़्फ़ बोर्ड, अल्पसंख्यक आयोग और वित्त विकास निगम में अफसरों की कमी आज भी बड़ी परेशानी बनी हुई है. हांलाकि विभाग के आलाअधिकारी एक साल के कामकाज को कामयाब बताते हैं.

नई सरकार ने अपने शुरुआती बजट में अल्पसंख्यक विभाग को जो बजट ज़ारी किया था उसमें से ज्यादातर बजट खर्च ही नहीं हो सका. लिहाज़ा तमाम ऐसी योजनाएं है जिन पर असर पड़ा है. इनमें प्रमुख है राज्य में कब्रिस्तानों की चाहदीवारी, बालिका  प्रोत्साहन योजना के तहत अल्पसंख्यक लड़कियों को साइकिल न मिल पाना और प्रदेश के मदरसों का  डिजिटलाइजेशन न हो पाना.


विपक्षी पार्टी कांग्रेस और अल्पसंख्यक मामलों के जानकार भी मानते हैं कि अल्पसंख्यकों के लिए महज़ बयानबाज़ी से हटकर सरकार को ज़मीन पर ठोस काम करने की ज़रूरत है.

उत्तराखंड सरकार ने अपने एक साल का जश्न बड़े ही आलीशान अंदाज़ में मनाया. इस दौरान सरकार और संगठन के सभी लोग इस जश्न में शामिल हुए. अब इस जश्न के बाद देखना होगा कि राज्य सरकार और अल्पसंख्यक मंत्रालय किस तरह योजनाओं को कब तक ज़मीनी हकीकत पर उतार पाएगा.

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