नैनीताल। हाईकोर्ट ने राज्य आंदोलनकारियों को सरकारी सेवा में क्षैतिज आरक्षण को असंवैधानिक घोषित कर दिया। कोर्ट के फैसले से राज्य आंदोलनकारी और सरकार को बड़ा झटका लगा है।
हाई कोर्ट ने राज्य आंदोलनकारियों को क्षैतिज आरक्षण देने के मामले में सुनवाई कर न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ ने राज्य आंदोलनकारियों की जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। उन्होंने पूर्व की खंडपीठ में न्यायमूर्ति सुधांशु धूूलिया द्वारा दिए गए आदेश को सही माना। न्यायमूर्ति धूूलिया ने राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण न देने सम्बंधित आदेश दिया था। जबकि न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी ने राज्य आंदोलनकारियों के पक्ष में निर्णय दिया था। दरअसल, पूर्व में खंडपीठ के न्यायधीशों में आरक्षण को लेकर अलग-अलग मत होने के कारण मुख्य न्यायधीश ने इस मामले को हाईकोर्ट की तीसरी बेंच को सुनने के लिए सौंपा था ।
उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी ने प्रदेश की सरकारी नौकरियों में दस फीसदी क्षैतिज आरक्षण देने की मांग कर रहे हैं। पिछली सरकार ने राज्य आंदोलनकारियों की मांग को देखते हुए दस फीसदी क्षैतिज आरक्षण की व्यवस्था कर दी थी। मामले के अनुसार पूर्व में राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण देने सम्बंधित सर्विस की रिट हल्द्वानी निवासी करुणेश जोशी ने दायर की थी। जिसको न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल ने खारिज कर दिया, परन्तु इस एकलपीठ के आदेश को खंडपीठ में चुनौती दी गई।
खंडपीठ ने इस याचिका को जनहित याचिका में तब्दील कर दिया। तब से अब तक इस मामले में हाई कोर्ट की कई बैंचों में सुनवाई हो चुकी है। यहां तक की साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को दुबारा सुनने के लिए हाई कोर्ट को रेफर कर दिया था। पूर्व में न्यायमूर्ति धूूलिया ने अपने निर्णय में राज्य आंदोलनकारियों को 10 प्रतिशत आरक्षण न देने का निर्णय दिया था और न्यायमूर्ति यूसी ध्यानी ने राज्य आंदोलनकारियों को आरक्षण देने की पहल की थी।
न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की एकलपीठ ने मामले को सुनने के बाद राज्य आंदोलनकारियों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने सम्बंधित सरकार के शासनादेश को गलत माना और न्यायमूर्ति सुधांशूू धूूलिया द्वारा दिए गए निर्णय को सही माना। इन द मेटर आॅफ अप्वाइंटमेंट एक्टिविस्ट द्वारा जनहित याचिका दायर की गयी थी। भवाली निवासी अधिवक्ता महेश चन्द पंत का कहना था कि अगर सरकार आरक्षण देती है तो उत्तराखंड के उन सभी लोगों को आरक्षण दें जिन्होंने इसमें भाग लिया था या फिर किसी को नहीं। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड को पृथक राज्य बनाने के लिए साल 1952 से लड़ाई चल रही थी इसमें सभी ने भाग लिया था। सिर्फ वे ही लोग नहीं जो जेल गए थे या जो शहीद हो गए थे ।


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