निकाय चुनाव कराए जाने को लेकर सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के बीत तनातनी खुलकर सामने आने के बाद अब ये चर्चा छिड़ गई है कि संवैधानिक संस्थाओं के बीच ये टकराहट क्यों. साथ ही ये भी चर्चा चल पड़ी है कि कहीं राज्य निर्वाचन आयोग ने प्रेस कान्फ्रेन्स में कहीं बातों से दोनों ही संस्थाओं के बीच की खिंची गयी लक्ष्मण रेखा को लांघा तो नहीं है. इसे एक तरफ सरकार की लेटलतीफी तो दूसरी तरफ निर्वाचन आयोग के अतिउत्साह की तरह देखा जा रहा है.

नगर निकायों के लेट परिसीमन और आरक्षण की स्थिति पर राज्य निर्वाचन आयुक्त सुबर्द्धन ने सरकार को खूब खरी खोटी सुनाई थी. निकाय चुनाव कराए जाने को लेकर पहली नजर में सरकार  की लेटलतीफी साफ दिखती है लेकिन, अब चर्चा चल पड़ी है कि कहीं राज्य निर्वाचन आयोग ने सरकार पर आरोप लगाकर दोनों संस्थाओं के बीच खिंची लकीर को पार तो नहीं कर लिया है.

इस चर्चा की मूल वजह बना है नगर निकायों का परिसीमन और आरक्षण की स्थिति जिसे लेकर निर्वाचन आयोग ने कल सरकार पर सवाल खड़े किए थे. पूर्व नौकरशाह एसएस पांगती मानते हैं कि इससे राज्य निर्वाचन आयोग को बचना चाहिए था.

एसएस पांगती ने कहा कि निकायों का परिसीमन और उनमें आरक्षण की स्थिति सरकार का विशेषाधिकार है और किसी भी सूरत में निर्वाचन आयोग को इसपर टिप्पणी करने का अधिकार नहीं है. बता दें कि निर्वाचन आयुक्त सुबर्द्धन ने कल हुई प्रेस कान्फ्रेन्स में कहा था कि उन्होंने सरकार से कहा था कि परिसीमन की वजह से चुनाव समय पर कराए जाने में दिक्कतें आएंगी.


निर्वाचन आयुक्त सुबर्द्धन ने पीसी में कहा था कि उन्हें सीएम से नहीं मिलाया गया. सबसे ज्यादा इस बात की चर्चा चल रही है कि आखिर निर्वाचन आयुक्त को मुख्यमंत्री से मिलने की ज़रूरत क्यों महसूस हो रही थी. इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि चुनाव आयोग तो कभी प्रधानमंत्री से नहीं मिलता ना ही चुनाव के बारे में पीएम से मीटिंग करता है.

इस मामले में  कानूनी पहलूओं को जब देखा तो पता चला कि नगर निकाय के एक्ट में ही इस बात का प्रावधान है कि निर्वाचन आयोग और सरकार आपसी तालमेल के साथ नगर निकाय चुनाव कराएंगे. लोकसभा या विधानसभा के चुनाव कराने की इससे बिल्कुल अलग प्रक्रिया है. अब सवाल उठता है कि ये कौन तय करेगा कि किस हद तक तालमेल की जरूरत है और कहां किसे रुक जाना है. राज्य निर्वाचन आयुक्त रहे हरिश्चन्द्र जोशी ने इसे बेहतर तरीके से समझाया.

पूर्व राज्य निर्वाचन आयुक्त हरिश्चन्द्र जोशी ने कहा कि भले ही सरकार और निर्वाचन आयोग के बीच समन्वय की बात हो लेकिन कभी भी ये नहीं लगना चाहिए कि निर्वाचन आयोग सरकार का हिस्सा है. उन्होंने यह भी बताया कि वे इस पद पर रहते हुए कभी भी सीएम से औपचारिक तौर पर नहीं मिले और चुनाव संबंधी जो भी काम हुए वे अधिकारियों से कराए गए.

इसमें कोई दो राय नहीं कि संस्थाओं के बीच टकराहट दिनों दिन बढ़ती जा रही है. यदि संस्था प्रमुख अपने आप को एक दूसरे से ऊपर मानकर काम करने के बजाय यदि एक दूसरे के साथ मानकर काम करें तो नतीजे जरूर बेहतर होंगे.

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