गरीब और अमीर के बच्चे में शिक्षा के स्तर को ठीक करने और निजी स्कूलों की मनमर्जी पर लगाम लगाने के लिए निजी सीबीएसई स्कूलों में एनसीईआरटी किताबें लागू करने का फ़ैसला सरकार ने ले तो लिया लेकिन किताबें बाज़ार में उपलब्ध ही नहीं हैं.
एनसीईआरटी की किताबें अब अमीर और गरीब दोनों वर्गो के बच्चें पढ़ेंगे. रियल इंडिया की तस्वीर बदल जाए, शिक्षा के स्तर में सुधार आए, इसके लिए प्रदेश सरकार ने हर स्कूल को एक समान शिक्षा देने का फरमान सुनाया था लेकिन सरकारी स्कूलों की तस्वीर नहीं बदल पा रही है.
पहली से पांचवीं तक की पढ़ाई एक कमरे के अंदर आज भी हो रही है. शिक्षकों की कमी आज भी है और एनसीईआरटी की पुस्तकें लागू होने के बाद भी तकरीबन हर सरकारी स्कूल में पुराना सिलेबस पढ़ाया जा रहा है. इसकी वजह यह है कि कई किताबें दुकानों में पहुंच ही नहीं पाई हैं.
बच्चों को डीबीटी के ज़रिये पैसा नहीं मिल पाया है और इस वजह से सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे किताबें नहीं खरीद पा रहे हैं. दुकानों में भी डिमांड ज्यादा और सप्लाई कम की स्थिति बनी हुई है, जहां किताबे पहुंची भी हैं वहां किताबों की हालत ठीक नहीं है. कई दुकानदारों की शिकायत है कि फटी किताबें सप्लाई की जा रही हैं.
इसके विपरीत शिक्षा मंत्री का दावा है कि हर दुकान में किताब पहुंच गई हैं. अभिभावक खुद किताबें खरीदें डीबीटी के जरिए पैसा उनके खाते में पैसा आ जाएगा लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि इन स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने वाले कई लोग मजदूर वर्ग के है जो खुद काम पर जाते हैं तो अपने बच्चों को स्कूल भेज देते हैं.
दिन भर की मजदूरी के बाद जो पैसा मिलता है उससे घर खर्च चल पा रहा है. वहीं पब्लिक स्कूल में अपने बच्चों को पढ़ाने वाले अभिभावकों को डर है कि शैक्षिक लिहाज़ से उनके बच्चे पीछे चले जाएंगे क्योंकि निजी पब्लिशरों की किताबें एनसीईआरटी किताबों के मुकाबले एडवांस्ड हैं.
स्कूल शुरू हुए चार दिन हो गए हैं और इन चार दिन से सरकारी स्कूल के बच्चे पुराना सिलेबस ही पढ़ रहे हैं. शिक्षा विभाग को सोचना चाहिए कि स्कूलों में शिक्षा के स्तर को सुधारना है तो पहले तो शिक्षकों की संख्या बढ़ाए और दूसरा जल्द से जल्द मानक तय कर डीबीटी के ज़रिए बच्चों के खातों में पैसा डाले ताकि नए सत्र की पढ़ाई शुरू तो हो सके.


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