देहरादून। सूबे की त्रिवेन्द्र सरकार ने तबादलों में पारदर्शिता लाने के लिए ट्रांस्फर एक्ट बनाया था लेकिन अधिकारियों से इसकी व्याख्या अपने अनुसार करनी शुरू कर दी है। प्रदेश के सबसे तेज तरार मंत्री माने जाने वाले कृषि मंत्री के विभाग में ही अधिकारियों ने तबादलों को लेकर चहेतों को सैट करना शुरू कर दिया है। कई वर्षो से मैदानी क्षेत्रों में जमे आधा दर्जन मंडी सहायकों को पहाड़ में चढ़ाने के बजाए मनमाफिक नियुक्ति दे दी है। यहां विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि 12 साल से ऋषिकेश मंड़ी में जमें मंडी सहायक केपी सिंह की चंद महिनों बाद ही मनमाफिक नियुक्ति देते हुए उन्हें देहरादून से दोबारा ऋषिकेश मंडी में ही तैनात कर दिया गया है।
सूबे में मुख्यमंत्री व कैबिनेट से पहाड़ में अधिकारियों की कमियों के चलते व ट्रांस्फर में अधिकारियों के खेल का खत्म करने के लिए स्थानान्तरण निति बनाई थी। साथ ही सभी विभाग के अधिकारियों को आदेश दिये थे कि 10 जून तक स्थानान्तरण कर दिये जाएं और लम्बे समय से मैदानी क्षेत्रों में जमें अधिकारियों को पहाड़ में चढाया जाए। लेकिन कुछ विभाग के अधिकारियों ने इस नियमावली की व्याख्या अपने हिसाब से करनी शुरू कर दी है। जिसका ताजा उदाहरण उत्तराखण्ड कृषि विपणन बोर्ड निदेशालय में देखने को मिला। जिसमें महाप्रबन्धक (प्रशासन) बीएस चलाल के माध्यम से जारी की गई ट्रास्फर लिस्ट में 6 मंडी सहायकों के स्थानान्तरण किये गये। लेकिन यह लिस्ट जारी होने से पहले ही विवादों में आ गयी। क्योंकि जिन 6 मंडी सहायकों के स्थानान्तरण किये गये है वह मैदानी क्षेत्रों में लम्बे समय से तैनात है उनमें से किसी का भी पहाड़ में स्थानान्तरण नहीं किया गया है। महाप्रबंधक बीएस चलाल ने मंडी सहायक जगदीश प्रसाद का स्थानान्तरण रुड़की से विकासनगर, बनमाली को सितारगंज से किच्छा, किशनपाल सिंह का देहरादून से ऋषिकेश, राजीव कुमार का मंगलौर से रुड़की, बृजपाल सिंह का विकासनगर से हरिद्वार व चन्द्रशेखर का ऋषिकेश से देहरादून किया गया है। इनमें से किशनपाल सिंह पिछले 12 सालों से ऋषिकेश में तैनात था और कुछ महीनों पहले ही उसका स्थानान्तरण ऋषिकेश से देहरादून किया गया था लेकिन कुछ महीनों बाद ही उसकी वापसी ऋषिकेश मंड़ी में कर दिया गया। जिससे साफ जाहिर होता है कि किशनपाल को ऋषिकेश मंड़ी से ऐसा क्या लालच है जो वह वहां का मोह छोड़ने को तैयार नहीं है।


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