देहरादून: उत्तराखंड गठन के बाद हुए चार विधानसभा चुनावों में खाता खोल पाने में नाकाम समाजवादी पार्टी अब अपने युवा अध्यक्ष अखिलेश यादव के नेतृत्व में देवभूमि में साइकिल दौड़ाने की उम्मीद पाल रही है। लोकसभा चुनाव से पहले जिस तरह अखिलेश यादव ने दो दिन उत्तराखंड प्रवास में बिताए, उससे कुछ इसी तरह के संकेत मिल रहे हैं। खासकर, सूबे के दो मैदानी जिलों, हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में सपा को अपने लिए सियासी जमीन नजर आ रही है। बहुजन समाज पार्टी ने जिस तरह अपना वजूद उत्तराखंड में खोया है, उससे सपा को भरोसा है कि उसके वोट बैंक को पार्टी के पक्ष में मोड़ा जा सकता है।
अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय सपा का सियासी प्रदर्शन इस क्षेत्र में ठीकठाक रहा। वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में सपा ने वर्तमान उत्तराखंड के भौगोलिक क्षेत्र में आने वाली 22 सीटों पर चुनाव लड़कर तीन पर जीत हासिल की। महत्वपूर्ण बात यह कि सपा को यह सफलता तब मिली, जब वर्ष 1994 के राज्य आंदोलन के चरम के दौरान सपा की छवि उत्तराखंड में खलनायक सरीखी बन गई थी। नौ नवंबर 2000 को जब उत्तराखंड अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया, उस वक्त उत्तर प्रदेश विधानसभा व विधान परिषद के 30 सदस्यों को लेकर अंतरिम विधानसभा का गठन किया गया था। तब अंतरिम विधानसभा में सपा के तीन सदस्य शामिल थ। उत्तराखंड गठन के बाद सपा की किस्मत बिल्कुल पलट गई।
वर्ष 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में सपा ने राज्य विधानसभा की 70 में से 63 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे, मगर जीत एक को भी नसीब नहीं हो पाई। इस चुनाव में सपा के हिस्से कुल 6.27 प्रतिशत मत आए। हालांकि इसके बाद वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में सपा ने अप्रत्याशित प्रदर्शन करते हुए राज्य की पांच में से एक, हरिद्वार लोकसभा सीट पर कब्जा जमाने में कामयाबी हासिल की। यह उत्तराखंड में सपा की अब तक की एक मात्र चुनावी जीत रही है। वर्ष 2007 के दूसरे विधानसभा चुनाव में सपा ने 55 विधानसभा सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए, लेकिन नतीजा इस बार भी सिफर रहा। मत प्रतिशत भी गिरकर 4.96 तक पहुंच गया। वर्ष 2012 में हुए तीसरे विधानसभा चुनाव में सपा ने 45 सीटों पर चुनाव लड़ा और केवल 1.45 प्रतिशत मतदाताओं का विश्वास ही हासिल कर पाई। कोई सीट जीतने का तो सवाल ही नहीं।
वर्ष 2017 में संपन्न राज्य विधानसभा के चौथे चुनाव में तो सपा बिल्कुल ही सिमट कर रह गई। राज्य की 70 विधानसभा सीटों में से पार्टी ने केवल 25 सीटों पर प्रत्याशी उतारे लेकिन इनमें से एक सीट पर भी वह जीत दर्ज नहीं कर पाई। महत्वपूर्ण बात यह कि इस बार उसका मत प्रतिशत महज 0.4 ही रह गया। साफ है कि उत्तराखंड में सपा की सियासी जमीन पिछले लगभग अठारह वर्षों में लगातार सिमट रही है। अलबत्ता, बसपा पहले तीन विधानसभा चुनावों में उत्तराखंड में तीसरी बड़ी सियासी ताकत के रूप में खुद को स्थापित करने में जरूर सफल रही। यह बात दीगर है कि पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनाव के दौरान नमो लहर में हाथी के पैरों तले भी जमीन गायब हो गई।


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