देहरादून: किसी भी क्षेत्र में रोजगार के अवसर मुहैया कराने की दिशा में औद्योगिक विकास की सबसे अहम भूमिका होती है। इस लिहाज से उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में देखें तो राज्य गठन से लेकर अब तक सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) ने जरूर रफ्तार पकड़ी है, लेकिन बड़े उद्योगों की गति मैदानी जिलों तक ही सिमटी हुई है। यह स्थिति तब है, जबकि राज्य गठन के बाद औद्योगिक विकास के लिए केंद्र से विशेष पैकेज मिला था। साथ ही 2008 में पहाड़ों में उद्योग चढ़ाने को बाकायदा नीति भी बनी थी। साफ है कि औद्योगिक विकास को गति देने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। हालांकि, मौजूदा राज्य सरकार जिस तरह से कोशिशें कर रही है, उससे अब पहाड़ों में भी उद्योग चढ़ सकेंगे। जाहिर है कि इस पहल से रोजगार के अभाव में निरंतर हो रहे पलायन पर भी अंकुश लग सकेगा।
उत्तराखंड के औद्योगिक विकास के सफर पर रोशनी डालें तो नौ नवंबर 2000 को राज्य गठन के वक्त यहां 1119 इकाइयां कार्यरत थीं और इनमें 2336 लोगों को ही रोजगार मिल रहा था। पूंजी निवेश था महज 7.10 करोड़। इसके बाद कोशिशें हुई तो एमएसएमई सेक्टर में ही उद्यमियों ने रुचि दिखाई। असल में अर्थव्यवस्था में एमएसएमई सेक्टर जीवंत और गतिशील क्षेत्र के रूप में उभरा। कम लागत में उद्यम स्थापना और रोजगार सृजन की दिशा में अहम भूमिका निभाने के साथ ही ये क्षेत्रीय असंतुलन को साधने और ग्रामीण व पिछड़े क्षेत्रों के औद्योगिक विकास में भी मददगार साबित होते हैं।


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