देहरादून: प्रदेश सरकार ने इन्वेस्टर्स समिट का आयोजन कर बड़े पैमाने पर निवेश की संभावनाएं जगाई हैं। जिस तरह से अभी निवेश के प्रस्तावों पर एमओयू साइन किए जा रहे हैं, उससे प्रदेश के विकास का मार्ग प्रशस्त होता दिख रहा है। हालांकि, इन उम्मीदों को धरातल पर उतारने के लिए सरकार के सामने कई चुनौतियां भी खड़ी हैं। इनसे पार पाने के लिए सरकार को बेहद गंभीरता से काम करने की जरूरत पड़ेगी।


प्रदेश में उद्योग स्थापित करने के लिए लंबे समय से प्रयास हो रहे हैं। राज्य के तीसरे मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी की उदार नीतियों के कारण प्रदेश में उद्योग स्थापित होने शुरू हुए। हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में सिडकुल की स्थापना की गई। प्रदेश में उद्योग तो आए लेकिन इन्हें पर्वतीय क्षेत्रों में चढ़ाने में कोई भी सरकार सफल नहीं हो पाई। हालांकि, वर्ष 2008 में पहाड़ों में उद्योग ले जाने को नीति भी बनी, लेकिन यह परवान नहीं चढ़ सकी। ऐसे में पहाड़ों में औद्योगिक विकास एक सपना होकर रह गया। अब इन्वेस्टर्स समिट के जरिये सरकार ने पर्वतीय क्षेत्रों में भी बड़े उद्योगों के स्थापित होने की उम्मीदों को पंख लगाए हैं। 

वन भूमि हस्तांतरण 

सरकार की पर्वतीय जिलों में उद्योग लगाने के लिए सबसे बड़ी चुनौती वन भूमि हस्तांतरण की है। वैसे तो सरकार ने सिंगल विंडो सिस्टम के तहत संबंधित अधिकारियों की समयबद्ध जिम्मेदारी तय की हुई है। 15 दिनों के भीतर फाइल का काम तो पूरा हो जाएगा लेकिन सबसे अहम काम वन भूमि हस्तांतरण का है। यह देखने में आया है कि वन भूमि के पेच के चलते कई बड़े उद्योग प्रदेश में स्थापित होने से वंचित रह गए। सरकार की नई उद्योग नीति में वन भूमि हस्तांतरण के लिए अधिकारियों की जिम्मेदारी तय है लेकिन यह इतना आसान नहीं होगा। प्रदेश के वन विभाग से लेकर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से इसकी अनुमति लेने की जटिल प्रक्रिया से गुजरना होगा।

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