देहरादून: यूं तो नारायण दत्त तिवारी उत्तराखंड के तीसरे मुख्यमंत्री बने, लेकिन पहली निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने का अवसर उन्हें ही मिला। पिछले 18 सालों में अब तक वह एकमात्र मुख्यमंत्री रहे, जिन्होंने अपने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। पैदाइश के बाद से ही सियासी अस्थिरता के भंवर में फंसे सूबे में तिवारी का बतौर मुख्यमंत्री पांच साल का कार्यकाल सर्वाधिक मुश्किलभरा रहा, बावजूद इसके वह अपने राजनैतिक कौशल और सूझबूझ से सभी चुनौतियों से पार पाने में कामयाब रहे।

नौ नवंबर 2000 को उत्तराखंड जब अलग राज्य बना, तब अंतरिम विधानसभा के गठन के बाद नित्यानंद स्वामी के नेतृत्व में पहली अंतरिम सरकार बनी। पहले दिन से ही उत्तराखंड (तब उत्तरांचल) राजनैतिक रूप से गहरे झंझावात में फंस गया। नतीजतन स्वामी मुख्यमंत्री के रूप में एक साल का कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाए। भगत सिंह कोश्यारी उनके उत्तराधिकारी बने मगर विधानसभा चुनाव तक उनके हिस्से लगभग चार महीने का ही कार्यकाल आया। वर्ष 2002 में राज्य में पहले विधानसभा चुनाव हुए और आश्चर्यजनक रूप से अलग राज्य गठन के श्रेय पर काबिज होने के बावजूद जनमत ने भाजपा को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। 

कांग्रेस ने यह चुनाव तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष हरीश रावत के नेतृत्व में लड़ा था और उन्हें ही मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार समझा जा रहा था। कांग्रेस आलाकमान ने तब इस सोच के विपरीत जाकर उस वक्त लोकसभा में नैनीताल सीट की नुमाइंदगी कर रहे नारायण दत्त तिवारी को हरीश रावत पर तरजीह देकर सबको चौंका दिया। रावत खेमा इस फैसले को पचा नहीं पाया और तिवारी की ताजपोशी की घोषणा के साथ ही कांग्रेस में अंदरूनी घमासान खुलकर सतह पर आ गया। महत्वपूर्ण बात यह कि इस चुनाव में कांग्रेस को 70 सदस्यीय विधानसभा में केवल 36 सीटें मिलीं थी, यानी महज बहुमत का आंकड़ा ही कांग्रेस ने छुआ।

एक ओर पार्टी के भीतर भारी विरोध और दूसरी तरफ बहुमत बस कहने भर को, इन विषम परिस्थितियों में तिवारी ने दो मार्च 2002 को राज्य की पहली निर्वाचित सरकार के मुखिया के रूप में कामकाज संभाला। हालांकि वक्त गुजरने पर तिवारी अपने राजनैतिक कौशल के बूते गैर भाजपा विधायकों को साधने में सफल रहे लेकिन पार्टी के भीतर उन्हें खासी दिक्कतों से रूबरू होना पड़ा। पांच साल के तिवारी के कार्यकाल के दौरान कई बार उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने की कोशिश की गई, सियासी गलियारों में चर्चाओं के दौर चले लेकिन वह एक-एक कर इन सभी चुनौतियों से पार पाते गए।

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