परमार्थ गंगा तट पर गोबर से बने उपलों से होगा हवन
भारत सरकार वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन सचिव श्री सी. के. मिश्रा जी ने हरित हवन में प्रथम आहूतियाँ समर्पित कर किया इस नवोदित पहल का शुभारम्भ
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने देशवासियों से किया आह्वान होलिका दहन में लकड़ियां के स्थान पर गोबर के उपलों का उपयोग कर पर्यावरण संरक्षण में दें सहयोग
हवन और पर्यावरण चले साथ-साथ-स्वामी चिदानन्द सरस्वती
19 मार्च, ऋषिकेश। होलिका दहन से पहले परमार्थ निकेतन ने की नवोदित शुरूआत। इस बार से होलिका दहन लकड़ियों से नहीं अपितु गोबर के उपलों से होगा। साथ ही परमार्थ गंगा तट पर विश्व शान्ति और पर्यावरण को स्वच्छ रखने के लिये किये जा रहे हवन में भी लकड़ियों का प्रयोग नहीं बल्कि गोबर के उपलों का प्रयोग किया जायेंगा। इसकी शुरूआत आज भारत सरकार वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन सचिव श्री सी के मिश्रा जी के हाथों से प्रथम आहूतियां समर्पित कर की गयी।
परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने देशवासियों से आह्वान किया कि होलिका दहन में लकड़ियां के स्थान पर गोबर के उपलों का उपयोग कर पर्यावरण संरक्षण में सहयोग दें। इसी तरह भारत के लगभग प्रत्येक घरों, मन्दिरों, पर्वों और सामाजिक उत्सवों के अवसर पर हवन होता है। हवन में लकड़ियों के स्थान पर गोबर के उपलों का प्रयोग करे तो यह एक नयी शुरूआत होगी और इससे हमारी परम्परा भी बचेंगी, पर्यावरण भी बचेगा, हवन भी होगा और पर्यावरण संरक्षण भी होगा। स्वामी जी ने कहा कि हवन और पर्यावरण चले साथ-साथ। हवन तो वैसे भी पर्यावरण को बचायें रखने के लिये किया जाता है। हवन, भीतर का पर्यावरण और बाहर का पर्यावरण दोनों की शुद्धि के लिये ही तो है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि हम लकड़ियों का जितना अधिक प्रयोग जलाने के लिये करेंगे उतने ही पेड़ कटते जायेंगे। पेड़, पर्यावरण के लिये, प्राणों के लिये, प्राणवायु के लिये और स्वच्छ हवा के लिये बहुत जरूरी है। उन्होने कहा कि वायु प्रदूषण बढ़ रहा है इसलिये हमें एक नयी शुरूआत करनी होगी। लोग अपने स्तर पर उपलों के प्रयोग की मुहिम को आगे बढ़ाये तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में विलक्षण परिवर्तन हो सकता है।
होली से पहले स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने उपलों से होलिका दहन तथा रंगों की होली को नशा मुक्त मनाने का संदेश दिया। उन्होने कहा कि होली का उत्सव तो मनाये परन्तु जल को बर्बाद न करें तथा होली के पावन अवसर पर कम से कम एक पेड़ का रोपण अवश्य करें। स्वामी जी महाराज ने कहा कि जो लोग लकड़ियों से होलिका दहन कर रहे है वे लोग यह भी संकल्प लें कि हम कम से कम एक-एक पेड़ अवश्य लगायेंगे। पर्यावरण के अनुकूल होली मनाने से परम्परा भी बचेंगी और पर्यावरण भी बचेंगा।
परमार्थ गंगा तट पर प्रतिदिन संयकाल को विश्व शान्ति और पर्यावरण संरक्षण के लिये होने वाले हवन में आज से गाय के गोबर से बने उपलों का प्रयोग किया जायेगा इससे विश्व स्तर पर पर्यावरण संरक्षण, गौ माता का संरक्षण और अपनी परम्पराओं को सहेजने का संदेश प्रसारित होगा।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज और भारत सरकार वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन सचिव श्री सी. के. मिश्रा जी ने गाय के गोबर से बने उपलों से हवन की नवोदित पहल में प्रथम आहूतियां समर्पित की। स्वामी जी महाराज ने हरित होली और हरित हवन का संकल्प कराया। सभी विशिष्ट अतिथियों ने परमार्थ गंगा तट पर होने वाली दिव्य गंगा आरती में सहभाग किया।
भारत सरकार वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन सचिव श्री सी. के. मिश्रा जी ने हरित हवन में प्रथम आहूतियाँ समर्पित कर किया इस नवोदित पहल का शुभारम्भ
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने देशवासियों से किया आह्वान होलिका दहन में लकड़ियां के स्थान पर गोबर के उपलों का उपयोग कर पर्यावरण संरक्षण में दें सहयोग
हवन और पर्यावरण चले साथ-साथ-स्वामी चिदानन्द सरस्वती
19 मार्च, ऋषिकेश। होलिका दहन से पहले परमार्थ निकेतन ने की नवोदित शुरूआत। इस बार से होलिका दहन लकड़ियों से नहीं अपितु गोबर के उपलों से होगा। साथ ही परमार्थ गंगा तट पर विश्व शान्ति और पर्यावरण को स्वच्छ रखने के लिये किये जा रहे हवन में भी लकड़ियों का प्रयोग नहीं बल्कि गोबर के उपलों का प्रयोग किया जायेंगा। इसकी शुरूआत आज भारत सरकार वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन सचिव श्री सी के मिश्रा जी के हाथों से प्रथम आहूतियां समर्पित कर की गयी।
परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने देशवासियों से आह्वान किया कि होलिका दहन में लकड़ियां के स्थान पर गोबर के उपलों का उपयोग कर पर्यावरण संरक्षण में सहयोग दें। इसी तरह भारत के लगभग प्रत्येक घरों, मन्दिरों, पर्वों और सामाजिक उत्सवों के अवसर पर हवन होता है। हवन में लकड़ियों के स्थान पर गोबर के उपलों का प्रयोग करे तो यह एक नयी शुरूआत होगी और इससे हमारी परम्परा भी बचेंगी, पर्यावरण भी बचेगा, हवन भी होगा और पर्यावरण संरक्षण भी होगा। स्वामी जी ने कहा कि हवन और पर्यावरण चले साथ-साथ। हवन तो वैसे भी पर्यावरण को बचायें रखने के लिये किया जाता है। हवन, भीतर का पर्यावरण और बाहर का पर्यावरण दोनों की शुद्धि के लिये ही तो है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि हम लकड़ियों का जितना अधिक प्रयोग जलाने के लिये करेंगे उतने ही पेड़ कटते जायेंगे। पेड़, पर्यावरण के लिये, प्राणों के लिये, प्राणवायु के लिये और स्वच्छ हवा के लिये बहुत जरूरी है। उन्होने कहा कि वायु प्रदूषण बढ़ रहा है इसलिये हमें एक नयी शुरूआत करनी होगी। लोग अपने स्तर पर उपलों के प्रयोग की मुहिम को आगे बढ़ाये तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में विलक्षण परिवर्तन हो सकता है।
होली से पहले स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने उपलों से होलिका दहन तथा रंगों की होली को नशा मुक्त मनाने का संदेश दिया। उन्होने कहा कि होली का उत्सव तो मनाये परन्तु जल को बर्बाद न करें तथा होली के पावन अवसर पर कम से कम एक पेड़ का रोपण अवश्य करें। स्वामी जी महाराज ने कहा कि जो लोग लकड़ियों से होलिका दहन कर रहे है वे लोग यह भी संकल्प लें कि हम कम से कम एक-एक पेड़ अवश्य लगायेंगे। पर्यावरण के अनुकूल होली मनाने से परम्परा भी बचेंगी और पर्यावरण भी बचेंगा।
परमार्थ गंगा तट पर प्रतिदिन संयकाल को विश्व शान्ति और पर्यावरण संरक्षण के लिये होने वाले हवन में आज से गाय के गोबर से बने उपलों का प्रयोग किया जायेगा इससे विश्व स्तर पर पर्यावरण संरक्षण, गौ माता का संरक्षण और अपनी परम्पराओं को सहेजने का संदेश प्रसारित होगा।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज और भारत सरकार वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन सचिव श्री सी. के. मिश्रा जी ने गाय के गोबर से बने उपलों से हवन की नवोदित पहल में प्रथम आहूतियां समर्पित की। स्वामी जी महाराज ने हरित होली और हरित हवन का संकल्प कराया। सभी विशिष्ट अतिथियों ने परमार्थ गंगा तट पर होने वाली दिव्य गंगा आरती में सहभाग किया।


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