अभिमान आग के समान होता है ,जो सब कुछ नष्ट कर देता है।
ऋशिकेश, 30जून। इंसान को किसी भी बात का अभिमान नही होना चाहिए। अभिमान आग के समान होता है ,जिसप्रकार आग में कुछ भी डाला जाए सब नष्ट हो जाता है ।उसी प्रकार अभिमान सब कुछ नष्ट कर देता है। यह विचार संत निरंकारी मंडल के साप्ताहिक आयोजन के दौरान गंगा नगर ऋषिकेश में रविवार को सत्संग के दौरान महात्मा महादेव कुडियाल ने व्यक्त करते हुए ने कहा कि जब जीवन में भक्ति आ जाती है तो अभिमान नष्टहो जाता है। जीव का कल्याण केवल विचार सुनने से नही बल्कि उन विचारो को जीवन में उतारने से होगा। सत्संग से ही काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार पर अंकुश लगाया जा सकता है। महात्मा कुडियाल ने कहा कि इंसान केवल शरीर को साफ करने की ओर ध्यान देता है आत्मा की शुद्धि के लिए नही। सत्संग के माध्यम से हमारी आत्मा की सफाई हो जाती है, और जब आत्मा साफ और निर्मल होगी तो परमात्मा की भक्ति में लगेगी। प्रभु परमात्मा की अनुभूति के बिना मानव जीवन सुन्दर नही हो सकता है। हर इंसान प्रेम और शांति से रहे, यही संदेश अवतारी महापुरूशों ने हर युग में दिया है। मानव जीवन में चालाकिया, चतुराईयां, होशियारी भरी पडी है। इन को दूर करके ही मन भक्ति में लग सकता है।
उन्होने कहा कि जबतक जीव को परमात्मा का बोध नही होगा तबतक मन की दूरियां खत्म नही हो सकती। महात्मा ने कहा कि परमात्मा का बोध जीव को एकत्व प्रदान करता है। इसलिए संत हमेशा इसी ओर मानव को मानवता का पालन करने के लिए प्रेरित करता आया है। उनका कहना था कि अति कृपा जासू पर होई पावं धरही मारग सोही। जिस पर परमात्मा की कृपा होती है वही सत्संग भक्ति के मार्ग पर चलता है। जप तप पूजा पाठ हवन यज्ञ ये सब भक्ति के प्रथम सीढी हो सक्ति है लकिन भक्ति नही है। उन्होंने
कहा कि मनुषय जन्म परमात्मा केा जानने के लिए मिला था इसलिए कहा गया बडे भाग मानुश तन पावां। अगर इस जन्म में भी परमात्मा की जानकारी नही की तो दोबारा यह जन्म नही मिलने वाला। इंसान और पशु में कोई अंतर नही है। भवन, बच्चे और भोजन यह सभी कार्य पशु भी कर रहा है और इंसान भी। अगर विवेक और बुद्धि का प्रयोग परमात्मा की जानकारी के लिए नही किया तो जीवन व्यर्थ है।
उन्होने रामचरित मानस का सहारा लेते हुए समझाया कि भगवान राम ने भी यही कहा है कि भक्त का स्वभाव सूप के समान हो जाना चाहिए। भक्त का जीवन सरल हो जाना चाहिए। भक्त के बोल और कर्म एक समान हो जाने चाहिए। कुडियाल ने आगे
कहा कि जब परमात्मा का ज्ञान केवल इतना है कि परमात्मा कण-कण समाया है। परमात्मा हर समय हर जगह मौजूद है। कहा कि परमात्मा का दर्शन करने के लिए किसी विषेश स्थान पर जाने की आवश्यकता नहीं वो हर जगह हर समय मौजूद है। कहा भी गया है कि हरि व्यापक सर्वत्र समाना प्रेम ते प्रगट भयी मै जना।
सत्संग कार्यक्रम की व्यवस्था सेवादल महात्माओं ने की।
कार्यक्रम का संचालन पूज्य अलका घलवान ने किया। इस अवसर पर ब्रांच संयोजक हरीश बांगा, संचालक. दुश्यंत वैद्य, कृष्णानंद खंडूरी,अनिल लिंगवाल, प्रीति, खुशी कुमाइ, अनिता नागपाल, अक्षित, ध्यान सिंह रावत, रीना, उमा शंकर , दुर्गा चमोली, समीर, गीतिका, पी एल शाह, निष्ठा कथूरिया, सोहन, मनीष, कृष्णा माताआदि ने अपने भाव रखें।
ऋशिकेश, 30जून। इंसान को किसी भी बात का अभिमान नही होना चाहिए। अभिमान आग के समान होता है ,जिसप्रकार आग में कुछ भी डाला जाए सब नष्ट हो जाता है ।उसी प्रकार अभिमान सब कुछ नष्ट कर देता है। यह विचार संत निरंकारी मंडल के साप्ताहिक आयोजन के दौरान गंगा नगर ऋषिकेश में रविवार को सत्संग के दौरान महात्मा महादेव कुडियाल ने व्यक्त करते हुए ने कहा कि जब जीवन में भक्ति आ जाती है तो अभिमान नष्टहो जाता है। जीव का कल्याण केवल विचार सुनने से नही बल्कि उन विचारो को जीवन में उतारने से होगा। सत्संग से ही काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार पर अंकुश लगाया जा सकता है। महात्मा कुडियाल ने कहा कि इंसान केवल शरीर को साफ करने की ओर ध्यान देता है आत्मा की शुद्धि के लिए नही। सत्संग के माध्यम से हमारी आत्मा की सफाई हो जाती है, और जब आत्मा साफ और निर्मल होगी तो परमात्मा की भक्ति में लगेगी। प्रभु परमात्मा की अनुभूति के बिना मानव जीवन सुन्दर नही हो सकता है। हर इंसान प्रेम और शांति से रहे, यही संदेश अवतारी महापुरूशों ने हर युग में दिया है। मानव जीवन में चालाकिया, चतुराईयां, होशियारी भरी पडी है। इन को दूर करके ही मन भक्ति में लग सकता है।
उन्होने कहा कि जबतक जीव को परमात्मा का बोध नही होगा तबतक मन की दूरियां खत्म नही हो सकती। महात्मा ने कहा कि परमात्मा का बोध जीव को एकत्व प्रदान करता है। इसलिए संत हमेशा इसी ओर मानव को मानवता का पालन करने के लिए प्रेरित करता आया है। उनका कहना था कि अति कृपा जासू पर होई पावं धरही मारग सोही। जिस पर परमात्मा की कृपा होती है वही सत्संग भक्ति के मार्ग पर चलता है। जप तप पूजा पाठ हवन यज्ञ ये सब भक्ति के प्रथम सीढी हो सक्ति है लकिन भक्ति नही है। उन्होंने
कहा कि मनुषय जन्म परमात्मा केा जानने के लिए मिला था इसलिए कहा गया बडे भाग मानुश तन पावां। अगर इस जन्म में भी परमात्मा की जानकारी नही की तो दोबारा यह जन्म नही मिलने वाला। इंसान और पशु में कोई अंतर नही है। भवन, बच्चे और भोजन यह सभी कार्य पशु भी कर रहा है और इंसान भी। अगर विवेक और बुद्धि का प्रयोग परमात्मा की जानकारी के लिए नही किया तो जीवन व्यर्थ है।
उन्होने रामचरित मानस का सहारा लेते हुए समझाया कि भगवान राम ने भी यही कहा है कि भक्त का स्वभाव सूप के समान हो जाना चाहिए। भक्त का जीवन सरल हो जाना चाहिए। भक्त के बोल और कर्म एक समान हो जाने चाहिए। कुडियाल ने आगे
कहा कि जब परमात्मा का ज्ञान केवल इतना है कि परमात्मा कण-कण समाया है। परमात्मा हर समय हर जगह मौजूद है। कहा कि परमात्मा का दर्शन करने के लिए किसी विषेश स्थान पर जाने की आवश्यकता नहीं वो हर जगह हर समय मौजूद है। कहा भी गया है कि हरि व्यापक सर्वत्र समाना प्रेम ते प्रगट भयी मै जना।
सत्संग कार्यक्रम की व्यवस्था सेवादल महात्माओं ने की।
कार्यक्रम का संचालन पूज्य अलका घलवान ने किया। इस अवसर पर ब्रांच संयोजक हरीश बांगा, संचालक. दुश्यंत वैद्य, कृष्णानंद खंडूरी,अनिल लिंगवाल, प्रीति, खुशी कुमाइ, अनिता नागपाल, अक्षित, ध्यान सिंह रावत, रीना, उमा शंकर , दुर्गा चमोली, समीर, गीतिका, पी एल शाह, निष्ठा कथूरिया, सोहन, मनीष, कृष्णा माताआदि ने अपने भाव रखें।

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