25 जुलाई, केंटकी, अमेरिका/ऋषिकेश। केंटकी, अमेरिका मे पांच दिवसीय संस्कार शिविर का आयोजन किया गया जिसमें लंदन, कनाडा और अमेरिका के विभिन्न शहरों के श्रद्धालुओं ने सहभाग किया। परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज और साध्वी भगवती सरस्वती जी का पावन सान्निध्य पाकर सभी भावविभोर हो गये। स्वामी जी ने भारतीय दर्शन, संस्कृति और संस्कारों की विस्तृत व्याख्या की। साथ ही वहां स्थित झील के तट पर गंगा आरती कर जल और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि अपने गांवों की ओर मुड़े, अपनी संस्कृति की ओर मुड़े, अपनी जड़ों से जुड़े। उन्होेने कहा कि जब समाज की संस्कृति नष्ट होने लगती है तो वह समाज भी धीरे-धीरे पथभ्रष्ट होने लगता है। भारतीयों के पास जुड़ने और जोेेड़ने के लिये अनेकों मंत्र है, उनका तो जीवन ही मंत्र है, उनका तो जीवन ही देने के लिये है, समाज के लिये है। समाज के लिये भारतीयों ने कोई संकोच नहीं किया और भारत ने कोई संकोच नहीं किया तथा पूरे विश्व को ही अपना परिवार बना दिया। विश्व, दूसरों के लिये बाजार होगा लेकिन भारत के लिये तो वह परिवार ही है। भारत एक ऐसा अमूल्य परिवार है जो सबकी बात करता है, सबके विकास की बात करता है, सबके विश्वास की बात करता है और सबको साथ लेकर चलने की बात करता है। यह भारत का सौभाग्य है कि भारत के पास इस समय यशस्वी, तपस्वी और ऊर्जावान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी है जो पूरे विश्व में भारतीयों के लिये एक प्रेरणा है। अपनी संस्कृति और संस्कारोें को जीने वाला एक व्यक्तित्व जो केवल भारतीयों के लिये नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिये सांस लेता है। वे भारतीयों को मिलकर सबको साथ लेकर, सबकोे साथ मिलाकर चलते है उनका विश्वास है कि भारत, पूरे विश्व का मार्गदर्शन कर सकता है और यह तभी सम्भव होगा जब हम अपने परिवारों को भारतीय संस्कृति और संस्कारों से जोड़े, अपनी भाषा से जोड़े अपने भोजन से जोड़े और सबका सम्मान करें तथा ’लव आॅल-सर्व आॅल’ के संदेेश को लेकर चलें। मुझे तो लगता है आज हमने अमेरिका की धरती पर जो संस्कार शिविर लगाया है इन्ही संस्कारों के माध्यम से आईये अपने परिवारों को अपनी संस्कृति का वरदान देते हुये तथा आपने संस्कारों को धारण करते हुये हम भारत को महान बनायें और विश्व की सेवा करें। सबसे बड़ी सेवा होती है ज्ञान सेवा, सबसे बड़ी सेवा होती है संस्कार सेवा, सबसे बड़ी सेवा होती है लोगों के दिलों को जोड़ना।
स्वामी जी महाराज ने कहा कि सर्वे भवन्तु सुखिनः के मंत्र हमें तो विरासत में मिले हुये है, दूध में मिले है उन्हें धूल में न जाने दें। जो संस्कार हमें विरासत में मिले है उन्हें विरासत बनाकर ही न रखे बल्कि उन्हें जीवन का हिस्सा बनायें। इन संस्कारों से पोषित बच्चे कहीं भी जायेंगे तो यह संस्कारों का प्रकाश हमेशा उनके साथ होगा।
स्वामी जी महाराज ने अप्रवासी भारतीयों से कहा कि यहां पर रहकर आपने बहुत कमाया है। अपना नाम कमाया, दाम भी कमाया और बड़े-बड़े धाम खड़े किये है लेकिन अब समय आया है जहां आपने जन्म लिया, आपके पूर्वजों ने जन्म लिया है वहां पर आप कुछ वापिस लौटायें और उनको भी साथ लेकर चलें जो आपकी प्रतीक्षा में है। आपकी जन्मभूमि से आपने बहुत कुछ पाया है अब देने का समय आ गया है। उन्होने कहा कि ’अपना गांव-अपना देश’ इस मंत्र को याद रखे। भारत के गावों की गरीबी के लिये, शिक्षा के लिये, चिकित्सा के लिये जो भी कर सके यही सबसे बड़ा यज्ञ होगा।
जीवा की अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि स्वामी जी महाराज ने सन 1997 से माँ गंगा के तट पर विशाल रूप से दिव्य आरती का क्रम आरम्भ किया था जो अब भी अनवरत रूप से हो रहा है तथा 1999 में बनारस में विशाल आरती का क्रम आरम्भ किया था जो आज अतुल्य भारत में शामिल है। यह गंगा आरती अब विश्व विख्यात हो गयी है अनेक लोग यहां से शान्ति लेकर लौटते है। साध्वी जी ने बताया कि पूज्य स्वामी जी जहां पर भी गयें, उन्होने जिस नदी, झील आौर सागर को देखा वहीं पर गंगा आरती को पहुंचाया यह एक बहुत बड़ा संदेश है गंगा जागरण के लिये, नदियों एवं पर्यावरण को बचाने का हेतु बहुत बड़ा संदेश है। आज यहां पर इतने प्यारे वातावरण में टिहरी जैसी सुन्दर झील के किनारे गंगा आरती करने का जो लोगों को आनन्द आया यह सचमुच दिव्य अनुभव है। साध्वी जी ने कहा कि ऐसे ही संस्कारों की गंगा हमारे जीवन में बहती रहे, हमारे दिलों में बहती रहे, इस गंगा को हमेशा जिंदा रखे तथा गंगा, गांव और गरीबोें के प्रति सहानुभूति रखें इस त्रिवेणी को सदैव याद रखें।
अमरीका में रह रहे अप्रवासी भारतीयों ने कहा कि स्वामी जी महाराज प्रतिवर्ष अमरीका के हर शहर में अपना समय दे सकें तो एक नया वातावरण, एक नयी ऊर्जा, एक नयी आस्था और संस्कारों का सिंचन अमरीका में रहने वाले लोगों के लिये भी वरदान बन सकता है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने मेरा गांव-मेरा देश और अपनी जड़ों से जुड़ने का संकल्प कराया।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि अपने गांवों की ओर मुड़े, अपनी संस्कृति की ओर मुड़े, अपनी जड़ों से जुड़े। उन्होेने कहा कि जब समाज की संस्कृति नष्ट होने लगती है तो वह समाज भी धीरे-धीरे पथभ्रष्ट होने लगता है। भारतीयों के पास जुड़ने और जोेेड़ने के लिये अनेकों मंत्र है, उनका तो जीवन ही मंत्र है, उनका तो जीवन ही देने के लिये है, समाज के लिये है। समाज के लिये भारतीयों ने कोई संकोच नहीं किया और भारत ने कोई संकोच नहीं किया तथा पूरे विश्व को ही अपना परिवार बना दिया। विश्व, दूसरों के लिये बाजार होगा लेकिन भारत के लिये तो वह परिवार ही है। भारत एक ऐसा अमूल्य परिवार है जो सबकी बात करता है, सबके विकास की बात करता है, सबके विश्वास की बात करता है और सबको साथ लेकर चलने की बात करता है। यह भारत का सौभाग्य है कि भारत के पास इस समय यशस्वी, तपस्वी और ऊर्जावान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी है जो पूरे विश्व में भारतीयों के लिये एक प्रेरणा है। अपनी संस्कृति और संस्कारोें को जीने वाला एक व्यक्तित्व जो केवल भारतीयों के लिये नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिये सांस लेता है। वे भारतीयों को मिलकर सबको साथ लेकर, सबकोे साथ मिलाकर चलते है उनका विश्वास है कि भारत, पूरे विश्व का मार्गदर्शन कर सकता है और यह तभी सम्भव होगा जब हम अपने परिवारों को भारतीय संस्कृति और संस्कारों से जोड़े, अपनी भाषा से जोड़े अपने भोजन से जोड़े और सबका सम्मान करें तथा ’लव आॅल-सर्व आॅल’ के संदेेश को लेकर चलें। मुझे तो लगता है आज हमने अमेरिका की धरती पर जो संस्कार शिविर लगाया है इन्ही संस्कारों के माध्यम से आईये अपने परिवारों को अपनी संस्कृति का वरदान देते हुये तथा आपने संस्कारों को धारण करते हुये हम भारत को महान बनायें और विश्व की सेवा करें। सबसे बड़ी सेवा होती है ज्ञान सेवा, सबसे बड़ी सेवा होती है संस्कार सेवा, सबसे बड़ी सेवा होती है लोगों के दिलों को जोड़ना।
स्वामी जी महाराज ने कहा कि सर्वे भवन्तु सुखिनः के मंत्र हमें तो विरासत में मिले हुये है, दूध में मिले है उन्हें धूल में न जाने दें। जो संस्कार हमें विरासत में मिले है उन्हें विरासत बनाकर ही न रखे बल्कि उन्हें जीवन का हिस्सा बनायें। इन संस्कारों से पोषित बच्चे कहीं भी जायेंगे तो यह संस्कारों का प्रकाश हमेशा उनके साथ होगा।
स्वामी जी महाराज ने अप्रवासी भारतीयों से कहा कि यहां पर रहकर आपने बहुत कमाया है। अपना नाम कमाया, दाम भी कमाया और बड़े-बड़े धाम खड़े किये है लेकिन अब समय आया है जहां आपने जन्म लिया, आपके पूर्वजों ने जन्म लिया है वहां पर आप कुछ वापिस लौटायें और उनको भी साथ लेकर चलें जो आपकी प्रतीक्षा में है। आपकी जन्मभूमि से आपने बहुत कुछ पाया है अब देने का समय आ गया है। उन्होने कहा कि ’अपना गांव-अपना देश’ इस मंत्र को याद रखे। भारत के गावों की गरीबी के लिये, शिक्षा के लिये, चिकित्सा के लिये जो भी कर सके यही सबसे बड़ा यज्ञ होगा।
जीवा की अन्तर्राष्ट्रीय महासचिव साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि स्वामी जी महाराज ने सन 1997 से माँ गंगा के तट पर विशाल रूप से दिव्य आरती का क्रम आरम्भ किया था जो अब भी अनवरत रूप से हो रहा है तथा 1999 में बनारस में विशाल आरती का क्रम आरम्भ किया था जो आज अतुल्य भारत में शामिल है। यह गंगा आरती अब विश्व विख्यात हो गयी है अनेक लोग यहां से शान्ति लेकर लौटते है। साध्वी जी ने बताया कि पूज्य स्वामी जी जहां पर भी गयें, उन्होने जिस नदी, झील आौर सागर को देखा वहीं पर गंगा आरती को पहुंचाया यह एक बहुत बड़ा संदेश है गंगा जागरण के लिये, नदियों एवं पर्यावरण को बचाने का हेतु बहुत बड़ा संदेश है। आज यहां पर इतने प्यारे वातावरण में टिहरी जैसी सुन्दर झील के किनारे गंगा आरती करने का जो लोगों को आनन्द आया यह सचमुच दिव्य अनुभव है। साध्वी जी ने कहा कि ऐसे ही संस्कारों की गंगा हमारे जीवन में बहती रहे, हमारे दिलों में बहती रहे, इस गंगा को हमेशा जिंदा रखे तथा गंगा, गांव और गरीबोें के प्रति सहानुभूति रखें इस त्रिवेणी को सदैव याद रखें।
अमरीका में रह रहे अप्रवासी भारतीयों ने कहा कि स्वामी जी महाराज प्रतिवर्ष अमरीका के हर शहर में अपना समय दे सकें तो एक नया वातावरण, एक नयी ऊर्जा, एक नयी आस्था और संस्कारों का सिंचन अमरीका में रहने वाले लोगों के लिये भी वरदान बन सकता है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने मेरा गांव-मेरा देश और अपनी जड़ों से जुड़ने का संकल्प कराया।


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