ऋषिकेश 25 जुलाई। उड़ान फाउंडेशन द्वारा मायाकुंड में संचालित निशुल्क उड़ान स्कूल में क्रांतिवीर अमर हुतात्मा श्रीदेव सुमन के बलिदान दिवस पर उनके चित्र पर पुष्प अर्पित कर उनको नमन किया गया इस अवसर पर स्कूल के संरक्षक एवं श्रीदेव सुमन की जीवनी पर आधारित हिंदी एवं संस्कृत भाषा में पुस्तक रचियता वरिष्ठ साहित्यकार आर पी डंगवाल ने कहा कि श्रीदेव सुमन उत्तराखंड की धरती के एक ऐसे महान अमर बलिदानी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सपूत का नाम है, जो एक लेखक, पत्रकार और जननायक ही नहीं बल्कि टिहरी की ऐतिहासिक क्रांति के भी महानायक थे। मशहूर हिंदी फिल्म आनन्द मे राजेश खन्ना को वह डायलॉग ‘जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए” बाबू मुशाय, अगर किसी व्यक्ति की जिन्दगी पर फिट बैठता है, तो वो हैं मात्र 29 वर्ष की अल्पायु में ही अपने देश के लिए शहीद होने वाले अमर शहीद श्रीदेव सुमन (मूल नाम श्रीदत्त बड़ोनी) का जन्म उत्तराखण्ड के टिहरी गढ़वाल जिले के ग्राम जौल में 25 मई, 1915 को हुआ था।सन 1930 में उन्होंने मात्र 14 वर्ष की किशोरावस्था में नमक सत्याग्रह आन्दोलन मे भाग लेकर ये साबित कर दिया था कि उनके अन्दर देश प्रेम की भावना किस हद तक भरी हुई थी।अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन प्रारम्भ होते ही उन्हें टिहरी आते समय 29 अगस्त 1942 को देवप्रयाग में गिरफ्तार कर लिया गया और 10 दिन मुनि की रेती जेल में रखने के बाद 6 सितम्बर को पहले ढाई महीने के लिए देहरादून जेल और फिर 15 महीने के लिए आगरा सेंट्रल जेल भेज दिया गया। 19 नवम्बर 1943 को आगरा जेल से रिहा होने के बाद वे फिर टिहरी में बढ़ रहे राजशाही के अत्याचारों के खिलाफ जनता के अधिकारों को लेकर अपनी आवाज बुलंद करने लगे। उन्हें 27 दिसम्बर 1943 को करीब डेढ़ माह में ही पुनः चम्बाखाल में गिरफ्तार कर लिया और 30 दिसम्बर को टिहरी जेल भिजवा दिया गया। 31 जनवरी 1944 को उन्हें दो साल का कारावास और 200 रुपये जुर्माना लगाकर उन्हें काल कोठरी में ठूंसकर भारी हथकड़ी व बेड़ियों में कस दिया। इस दुव्र्यवहार से खीझकर इन्होंने 29 फरवरी से 21 दिन का उपवास प्रारम्भ किया।इस दौरान उन्हें बेंतों की सजा भी मिली। इस पर उन्होंने 3 मई 1944 से राजशाही के खिलाफ जेल में ही 84 दिन की ऐतिहासिक भूख हड़ताल-आमरण अनशन शुरु कर दिया। तमाम उत्पीड़न, उचित उपचार न दिये जाने व लंबे उपवास के कारण 24 जुलाई की रात से ही उन्हें बेहोशी आने लगी और 25 जुलाई 1944 को शाम करीब चार बजे इस अमर सेनानी ने अपने देश व अपने आदर्शों की रक्षा के लिये 209 दिन नरकीय जीवन बिताने के बाद अपने प्राणों की आहुति दे दी।लेकिन उनकी शहादत व्यर्थ नहीं गयी।अपने जीते जी न सही, अपनी शहादत के बाद वे अपना मकसद पूरा कर गये। उनकी शहादत का जनता पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उनके बलिदान का अघ्र्य पाकर टिहरी राज्य में आंदोलन और तेज हो गया। जनता ने राजशाही के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया। इसके फलस्वरूप टिहरी रियासत को प्रजामंडल को वैधानिक करार देने को मजबूर होना पडा।इस मौके पर स्कूल के निदेशक डॉ राजे नेगी,समाज सेवी कमल सिंह राणा,पर्यावरण सचेतक  विनोद जुगरान,उत्तम सिंह असवाल,मयंक भट्ट,प्रिया क्षेत्री,मीनाक्षी राणा,मंजू देवी उपस्तिथ थी।

Post A Comment: