उत्तराखंड में 80 फ़ीसदी से अधिक सरकारी निर्माण करने वाले उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम के जीएम ने निगम पर भ्रष्टाचार के आरोपों को ग़लत बताया है. 1980 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने निगम को उत्तराखंड में आधारभूत सरंचना के काम देने शुरू किए और आज पंत विश्वविद्यालय, दून विश्वविद्यालय, घुड़दौड़ी इंजीनियरिंग कॉलेज समेत ज़्यादातर स्कूल, कॉलेज इसी निगम ने बनाए हैं.
लेकिन फिर यूपीआरएनएन पर एक के बाद एक घोटालों के आरोप लगने लगे और राज्य सरकार ने निगम को कोई भी नया काम देने पर रोक लगा दी. हाल ही में निगम के कार्यों को लेकर यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत के बीच देहरादून में मंत्रणा हुई थी. बैठक में यह तय किया गया था कि निगम द्वारा जो भी कार्य 75 फीसदी या उससे अधिक पूर्ण कर लिया जाएगा उसका भुगतान किया जाएगा. इसके बाद घोटालों के आरोपों का जवाब देने निगम के महाप्रबंधक पीके शर्मा बुधवार को मीडिया के सामने आए.
यूपीआरएनएन (उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम) के महाप्रबंधक पीके शर्मा ने कहा कि प्रदेश में निगम को 804 करोड़ रुपये के कार्य मिले जबकि आरोप लगाए जा रहे हैं कि इसमें 800 करोड़ के घोटाले कर दिए गए. उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर यह सब कैसे संभव है? शर्मा ने कहा कि 804 करोड़ रुपये में से 4 करोड़ के कार्य ही प्रदेश में कराए जा रहे हैं? शर्मा ने कहा कि निगम प्रदेश में जो भी कार्य कर रहा है उनकी औसत प्रगति 75 फीसदी है. 25 फीसदी जो भी कार्य रुके हुए हैं वह बजट न मिलने के कारण रुके हैं.
निगम के महाप्रबंधक ने कहा कि निगम पर आरोप लगाया जा रहा है कि उसने सिडकुल में प्रॉक्योरमेंट नियमों और वर्क मैनुअल का पालन न कर करीब 700 करोड़ की अनियमितता की है जबकि सच्चाई यह है कि सभी कार्य शासन द्वारा वर्ष 2009 और 2014 में दिए गए निर्देशों और विभागीय पद्यति के अनुसार किए जा रहे हैं.
शर्मा के अनुसार निगम पर यह भी आरोप लगाया गया कि सेंटेज में छूट की वजह से उसने करीब 100 करोड़ की अनियमितता की जबिक हकीकत यह है कि निगम को सेंटेज में कोई राहत ही नहीं दी गई है. वर्ष 2008 से पहले निगम द्वारा शेड्यूल रेट पर 5 फीसदी और बाद में 12.50 फीसदी सेंटेज जोड़कर आगणन गठित किया जाता था. बाद में राज्य शासन ने सेंटेज में कटौती की और 5 फीसदी की कटौती को भी बंद कर दिया.
गौरतलब है कि उत्तराखंड शासन के वित्त विभाग द्वारा आगणनों के बाद ही राशि जारी की जाती है. शर्मा का कहना था कि निगम के प्रबंध निदेशक द्वारा ही 5 प्रतिशत की कटौती किए बिना 6.50 फीसदी सेंटेज चार्जेज पर कार्य की सहमति दी गई थी और वर्ष 2009 में उत्तराखंड शासन ने इस रेट के सेंटेज पर कार्य आवंटित करने का शासनादेश जारी किया. शर्मा का कहना था कि निगम ने अब तक किसी भी योजना पर स्वीकृत धनराशि से अधिक खर्च नहीं की है और जिन योजनाओं का जितना बजट स्वीकृत हुआ था उसकी पूर्ण धानराशि उपलब्ध नहीं हुई है. इसकी वजह से अवशेष धनराशि की मांग की जा रही है.
कई ऐसे विभाग हैं जिन्होंने अपनी स्वीकृत योजनाओं में अतिरिक्त कार्यों को भी जोड़ा. इस बीच बाजार में सामग्री के रेट बदल गए. इस वजह से उन विभागों के स्वीकृत बजट का आकलन दोबारा किया गया और अमुक विभाग द्वारा स्वीकृति के बाद कार्य किए जा रहे हैं.
निगम के महाप्रबंधक ने बताया कि जिन योजनाओं का कार्य पूर्ण कर लिया गया उनकी अवशेष धनराशि का आंकलन तमाम ऑडिट्स के बाद ही किया गया. ऐसी कई परियोजनाएं हैं जो पूर्ण हो चुकी हैं और उनकी कर देयता और ठेकेदार की देयता अवशेष है. ऐसी परियोजनाओं की देयता खत्म होने के बाद जो भी धनराशि अवशेष होगी निगम उसे संबंधित विभाग को वापस करेगा.
शर्मा ने बताया कि ऑडिट विभाग ने आपत्ति दर्ज की है कि कुछ ऐसी निर्माण योजनाएं हैं जिनके लिए प्राप्त धन के सापेक्ष अर्जित ब्याज को वापस नहीं किया गया. निगम ने ऐसी योजनाओं से जुड़े विभागों को इस बाबत पहले ही सूचित कर दिया है. ऐसी योजनाओं की ब्याज राशि से लेबर सेस और सर्विस टैक्स काटा जाएगा.


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