वास्तव मे भारत की सीमाओं के भीतर कहीं एक और भारत दिखता है तो वह है पूर्वोत्तर के राज्य। इसकी भौगोलिक स्थिति , भाषाई विविधता , सांस्कृतिकपहलू और प्राकृतिक सुन्दरता।फिर कुछ चीन की संस्कृति से प्रभावित लेकिन रहन-सहन भारतीयता से परिपूर्ण और बदला-बदला सा खानपान इस बात का ही अहसास कराता है। पूर्वोत्तर क्षेत्र हमेशा भारत की विविधता में एकता की संस्कृति को रेखांकित करता है।उसकी सुंदरता के क्या कहने, प्राकृतिक विविधताओं के बीच नदी में लिपटा संसार का सबसे लंबा द्वीप, कंचनजंघा की
बर्फीली पहाड़ियों पर दूर से नजर आते सर्पीले रास्ते, दुनिया का सबसे नम स्थान, घने मनोहारी जंगल, मूसलाधार बारिश,देश भर को चाय का मजेदार स्वाद पहुंचाने वाले चाय के बाग, सौंदर्य बिखेरते परंपरागत आवास और जंगलों में गैंडे व याक का वास।वास्तव मे यही है सेवन सिस्टर्स यानी पूर्वोत्तर की पहचान।लेकिन यहां ये कहने मे हर्ज नही कि राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में इस इलाके के प्राकृतिक संसाधनों का समुचित दोहन होना अब भी बाकी है।बहुत पहले पूर्वोत्तर के लोगों के लिए आचार्य विनोबा भावे ने कहा था
कि अँगरेजों ने जो स्वतंत्रता दी, वह उनके पॉकेट में ही रही।शायद आचार्य की यह बात आजाद भारत के 70 साल बाद भी सही जान पड़ती है। क्यों कि जमीनी हकीकत मे पूर्वोत्तर भारत की हालत बहुत बदली नहीं है।बरसों से चल रहे उग्रवाद और राजनीतिक अस्थिरता से जूझता यह इलाका धनी साहित्यिक व सांस्कृतिक विरासत के बावजूद विकास की राह पर बहुत पीछे छूट गया है।प्राकृतिक सौंदर्य से भरे पूरे इलाके के कई राज्य उग्रवाद के शिकार हैं जिसके चलते पूर्वोत्तर की राजनीति भी देश में मुख्यधारा की राजनीति से हाशिए पर ही रहती है।कई बार तो स्वतंत्रता दिवस भी पूर्वोत्तर के लोगों के लिए एक आम हड़ताल के तौर पर ही गुजर जाता है।अरुणांचल प्रदेश , 
मणिपुर , मेघालय , मिजोरम , नागालैंड , त्रिपुरा , असम और सिक्किम , इन आठ राज्यों को मिलाकर बना पूर्वोत्तर क्षेत्र 2 लाख 62  हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है।एक लम्बी अंतर्राष्ट्रीय सीमा और एक संकरी पट्टी जिसे आम तौर पर सिलीगुड़ी गलियारा या चिकेन नेक के नाम से जाना जाता है के द्वारा भारत से जुड़ा है।यह न केवल आर्थिक विकास के लिहाज से  महत्वपूर्ण क्षेत्र है वरन इसका अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक और संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र होने की वजह से सामरिक व रणनीतिक महत्व भी बहुत है।
  दरअसल आजादी से पहले इस इलाके को नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एरिया यानी नेफा कहा जाता था। देश की आजादी के बाद इसे असम का नाम दिया गया। उसके बाद प्रशासनिक सहूलियतों और स्थानीय आबादी की मांग को ध्यान में रखते हुए धीरे धीरे यह सात छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया।लेकिन राज्यों के छोटे होने के साथ विकास के पायदान पर आगे बढ़ने के बजाय समस्याएं कई गुना बढ़ती गईं।असम से सबसे पहले 1 दिसंबर 1963 को नगालैंड अलग हुआ। उसके बाद वर्ष 1972 में मणिपुर, त्रिपुरा व मेघालय का गठन हुआ। बाद में मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश भी अलग राज्य बने। लेकिन असम को छोड़ दें तो बाद में उससे अलग होकर बनने वाले यह छोटे राज्य अपने जन्म के साथ ही उग्रवाद और राजनीतिक अस्थिरता की चपेट में आ गए। फिलहाल मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश को उग्रवाद के लिहाज अपेक्षाकृत शांत माना जा सकता है। लेकिन मिजोरम लालदेंगा और फिजो की अगुआई में दो दशकों तक उग्रवाद का दंश
झेल चुका है। इसी तरह अरुणाचल भी पड़ोसी नगालैंड के उग्रवादी गुट एनएससीएन के उग्रवादियों की हरकतों से परेशान है। मणिपुर में तो हालात बेहद खराब हैं। इस छोटे-से पर्वतीय राज्य में कम से कम तीन दर्जन उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं और राज्य में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम लागू होने के बावजूद उनको कानून व व्यवस्था का कोई खौफ जमीनी हकीकत मे नहीं दिखता है। इस अधिनियम के बावजूद राज्य में तैनात असम राइफल्स के जवान या तो उग्रवादियों तक नहीं पहुंच पाते या फिर वह भी उनसे खौफ खाते
हैं?
  पूर्वोत्तर क्षेत्र के जानकार कहते हैं कि तमाम  प्राकृतिक संसाधन के बावजूद अब तक खास विकास नहीं हो पाने की एक प्रमुख
वजह राजनीतिक अस्थिरता है। असम के अलावा बाकी राज्यों में विधानसभा के 30 से 60 तक सदस्य होते हैं। ऐसी स्थिति में दो-चार विधायकों के पाला बदलते ही सरकारें रातोरात बदल जाती हैं। यही वजह है कि चुनाव जीत कर सत्ता में आने वाली पार्टी किसी तरह जोड़-तोड़ कर अपनी सरकार बचाने में जुटी रहती है तो दूसरी ओर विपक्ष उसे गिराने में। असम राजनीतिक रूप से स्थिर भले है, उग्रवाद की समस्या यहां भी बहुत पुरानी है। राज्य में उल्फा और बोडो उग्रवादी संगठनों ने कई दशकों से कहर बरपा रखा है। दरअसल, केंद्र सरकार
जब किसी संगठन के एक गुट के साथ बातचीत की प्रक्रिया शुरू करती है तो दूसरा गुट इसके विरोध में खड़ा हो जाता है।दरअसल यह कभी नहीं खत्म होने वाली एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें इलाके के आम लोग पिसने को मजबूर हैं।
पूर्वोत्तर क्षेत्र की पड़ताल करने पर पता चलता है कि आज बिजली उत्पादन की अपार संभावनाओं के बावजूद पूर्वोतर के लगभग सभी
राज्य बिजली की कमी से ग्रस्त है। बिजली की कमी का सर्वाधिक स्पष्ट प्रभाव यहाँ के ग्रामीण इलाको में देखा जा सकता है। इससे क्षेत्र के आर्थिक विकास में भी बाधा पहुँच रही है। पूर्वोत्तर क्षेत्र अपने भौगोलिक स्थिति के कारण हमेशा से एक बेहतर सड़क संरचना के अभाव से ग्रस्त है। पूर्वोत्तर में सड़क नेटवर्क को देखे तो यहाँ कुल सड़क नेटवर्क की लम्बाई करीब 82 हजार किलोमीटर है। यह सबसे अधिक असम में 35 हजार किलोमीटर उसके बाद अरुणांचल प्रदेश में 15 हजार किलोमीटर है। शेष राज्यों में इसकी लम्बाई 5 हजार से 9 हजार किलोमीटर तक है। पूर्वोत्तर में रेल परिवहन के लिए भी काफी चुनौतियां है। कितने ही प्रयासों के बावजूद आज तक यहाँ सम्पूर्ण रेल परिवहन का विकास संभव नहीं हो सका है। देश के कुल रेल तंत्र का यहाँ केवल चार फीसदी ही मौजूद है। दुर्गम प्राकृतिक संरचना के कारण इस क्षेत्र में परिवहन का सबसे उपयुक्त माध्यम विमान सेवाए ही है। पूर्वोत्तर क्षेत्र में कुल 23 हवाई अड्डे है जिनमे से 11 का उपयोग अभी किया जा रहा है। अन्य के उन्नयन की योजनाये बन रही है। ताकि इस क्षेत्र में हावाई यात्रा के साधन को अपेक्षानुरूप बनाया जा सके।
वास्तव मे नार्थ-ईस्ट भारत का नगीना है जिसकी राष्ट्र-व्यापी पहचान बहुत जरुरी है। पूर्वोत्तर के लोगों में वह ताकत है कि वे शिक्षा और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में बेंगलुरु को भी पीछे छोड़ सकते हैं।यहों के लोगों ने खेल के मैदान से ले कर कई क्षेत्रों मे देश को बहुत कुछ दिया भी है।महिला बाक्सिंग मे मेरीकाम के पंच तो देश और विदेश के लोगों को याद ही हैं।लेकिन फीफा के अंडर-17 विश्व कप की भारतीय 
फुटबॉल टीम में अधिकाँश खिलाड़ी नार्थ-ईस्ट से ही थे जिनके बारे में बहुत कम लोगों को पता है।आज नार्थ-ईस्ट के लोग  होटल इंडस्ट्री, शिक्षा, हॉस्पिटैलिटी जैसे कई क्षेत्रों में नए आयाम स्थापित कर सभी को अचंभित कर रहे हैं।यहां हस्तशिल्प के अदभुत नमूने भी देखने को मिलते हैं। वास्तव मे पूर्व की केंद्र सरकारों ने पूर्वोत्तर के लिए योजनाएं तो बहुत बनाई लेकिन ये कोशिश नही कर सकी कि योजनाओं का लाभ यहां की जनता जल्दी और सही तरीके से मिल सके।अब मोदी सरकार भी पूर्वोत्तर भारत को विकास की दौड़ में शामिल करवाने की कोशिश कर रही है और विकास की बहुत सारी योजनाएं शुरू की गयी हैं।लेकिन चरमपंथी संगठनों की हठधर्मी और राजनीतिक उथल पुथल के कारण ये योजाएं भी समय से काफी पीछें हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना एक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत मणिपुर की 84 किमी लंबी जिरिबाम-तुपुल रेलवे लाइन का काम भी इन चरमपंथी संगठनों के विरोध की वजह से निर्धारित समय से पीछे चल रहा है। इसके अलावा , पूर्वोत्तर क्षेत्र हेतु विशेष त्वरित सड़क विकास कार्यक्रम के अंतर्गत 1740 किलोमीटर लम्बी सड़को के सुधार व निर्माण का लक्ष्य रखा गया है। इस बीच पूर्वोत्तर की 10 रेलवे परियोजनाओं को राष्ट्रीय परियोजना के रूप में स्वीकारा गया है। 
पूर्वोत्तर क्षेत्र में जलमार्गो व बन्दरगाहो के विस्तार हेतु अनेक परियोजनाएं प्रस्तावित है। इनमे शामिल है , बांग्लादेश की सीमा से
डिब्रूगढ़ तक ब्रह्मपुत्र नदी से एक 45 मित्र चौड़ी नहर , बराक नदी से पूरे जलमार्ग हेतु 40 मीटर चौड़ी नहर बनाना। अन्य जलमार्गो के विकास की भी योजनायें है। पूर्वोत्तर क्षेत्र में जल विद्युत की अपार संभावनाएं है।हांलाकि प्रधानमंत्री मोदी ने मोदी ने पिछले साल मिजोरम के कोलासिब जिले में 60 मेगावाट क्षमता वाली एक पनबजिली परियोजना का उद्घाटन करने के बाद उन्होंने इलाके में विकास के प्रति केंद्र के संकल्प को दोहराया था।
एक अनुमान के मुताबिक़ यहाँ करीब 62 हजार मेगावाट तक जल बिजली पैदा की जा सकती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते 
हुए पूर्वोत्तर परिषद् और पावरग्रिड कॉर्पोरेशन ने मिलकर एक विस्तृत योजना बनाई है। जिस पर करीब 10 हजार करोड़ की लागत का  अनुमान है। इसके अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण योजनाये भी बनी है। जिनमे एक है , अरुणांचल प्रदेश में करीब 100 प्रोजेक्टों के ठेके दिए गए है। जो कि जल विद्युत विकास से सम्बंधित है। त्रिपुरा में भी पलातना और मोनारचाक में गैस आधारित दो परियोजना पर कार्य चल रहा है। नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन बोगईगाँव ताप बिजली घर का निर्माण शुरू किया है।कुल मिला कर कहा जा सकता है कि अपार संभावनाओं से भरा यह क्षेत्र कुछ भौगोलिक व अन्य कई कारणों से विकास के लक्ष्यों से कोसों दूर है।आवश्यकता इस बात की है कि बेहतर कार्य नीतियों व समन्वित नियोजन के साथ इस क्षेत्र का विकास तय किया जाए। साथ ही सरकार को विकास के समग्र परिभाषित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अपनी उत्कृष्ट तकनीक व विशेषज्ञीय क्षमता का प्रयोग करना होगा। क्षेत्र के युवाओं में विचलन की प्रवृति काफी अधिक हो रही है। इससे निपटने के लिए रोजगार सृजन के प्रयास करने होंगे। साथ ही शिक्षित युवाओं के बीच कैरियर काउंसलिंग की व्यवस्था कर उनको अखिल भारतीय सेवाओं में जाने के लिए  प्रेरित , प्रशिक्षित किया जा सकता है।अब त्रिपुरा के अलावा मेघालय व
नागालैंड की जनता अपनी नई सरकार चुनने वाली है तो जाहिर है कि उनकी उम्मीदें भी बहुत ज़्यादा होगीं।इस लिए सबके साथ सबके लिए एक बेहतर आधारभूत संरचना और विकास के राह पर अग्रसर अर्थव्यवस्था के लिए इन राज्यों और केन्द्र की सरकार को वास्तविक प्रतिबद्धता जतानी होगी। 
                            ** शाहिद नकवी**.

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