देहरादून के बीजेपी ऑफ़िस में शनिवार को ज़हर खाकर अपनी फ़रियाद सुनाने वाले और मंगलवार को मारे जाने वाले प्रकाश पांडे आखिर थे कौन? मीडिया और सोशल मीडिया में उनकी जो रिकॉर्डिंग चल रही है उससे तो यही पता चलता है कि वह हल्द्वानी के एक ट्रांस्पोर्टर थे और कर्ज़ की वजह से परेशान थे जिसकी वजह उन्हें नोटबंदी और जीएसटी लगती थी.
लेकिन प्रकाश पांडे इस सनसनीखेज ख़बर से बाहर एक इंसान थे, हंसमुख ज़िंदादिल इंसान. एक ऐसा आदमी जो आसानी से दबाव में नहीं आता और दूसरों के लिए प्रेरणा का सबक बनता है.
यह बातें प्रकाश पांडे की तबियत ख़राब होने के बाद देहरादून पहुंचे उनके परिजनों और मित्रों से बातचीत में पता चलीं.
उनके मकान मालिक और करीबी दोस्त सुशील कुमार थापा भी एक ट्रांस्पोर्ट कारोबारी हैं. वह बताते हैं कि जीएसटी लागू होने के बाद उनका और प्रकाश का ट्रांसपोर्ट का बिजनेस बुरी तरह से प्रभावित हुआ है.
प्रकाश पांडे के पास चार ट्रक थे जो उन्होंने किस्तों में ख़रीदे थे. जीएसटी और नोटबंदी लागू होने के बाद से इनकी किस्तें जाना भी मुश्किल हो गया था लेकिन वह अपनी परेशानी के बावजूद मुस्कुराते दिखते थे.
थापा कहते हैं कि जीएसटी लागू होने के बाद उनके माथे पर चिंता की लकीरें दिखाई देती थीं लेकिन प्रकाश कभी परेशान नहीं दिखे. किसी को नहीं पता था कि उनके अंदर कितनी उथल-पुथल मची हुई थी.
प्रकाश पांडे की पत्नी कमला को भी कभी नहीं लगा कि वह किसी बात से परेशान हैं. वह तो कहती हैं कि देहरादून आने से पहले भी ऐसा नहीं लग रहा था कि वह अपनी जिंदगी खत्म करने जैसा घातक कदम उठाएंगे.
उनके दो बच्चे हैं. बेटी सातवीं क्लास में पढ़ती है और बेटा ग्याहरवीं क्लास में. बेटा दसवीं में हल्द्वानी का टॉपर रहा था. यह बताते-बताते आवाज़ भर्रा जाती है कि प्रकाश बेटे के भविष्य को लेकर क्या-क्या प्लान बनाते थे.
थापा कहते हैं कि प्रकाश पांडे सा जिंदादिल इंसान उन्होंने नहीं देखा. थापा के घर में चार किराएदार रहते हैं. दिवाली के दिन प्रकाश सभी परिवारों के लिए पटाखे लेकर आते थे और सब बच्चे मिलकर उन्हे जलाते थे.
वह हैरान हैं कि इतने बड़े दिल और मजबूत इरादों वाला आदमी ऐसा कदम कैसे उठा सकता है..... यह कहते-कहते उनकी आंखें छलक जाती हैं और वह मुंह फेर लेते हैं जैसे इस हकीकत का सामना करने से डर रहे हों.


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