देव कृष्ण थपलियाल                              
ये सही है की सत्रह साल के इस पहाडी राज्य का जन्म एक बडे आॅदोलन के गर्भ से हुआ, परन्तु इसका मतलब ये तो नहीं की यह ’राज्य की नियति’ ही बन जाय, किसी भी राज्य के गठन के पीछे की सोच ’आॅदोलनों का विस्तार’ कभी भी नहीं हो सकती है ? लेकिन इस पहाडी राज्य के गठन के बाद की सबसे बडी दुविधा यही रही की आज किसान, मजदूर, छात्र, नौजवान, कर्मचारी व मातृ शक्ति अपनें जायज अधिकारों के हर दम झण्डा थामें सडकों पर हैं ? यह उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के उन दिनों की याद ताजा कराती है, जब लखनऊ में बैठी सरकार, पहाडियों का उपहास उडाया करती थी, यहाॅ के लोंगों की सरलता और भोलापन ही उनकी कमजोरी समझी जाती रही, उनकी कठनाईयों, परेशानियों, को भला वे समझते भी कैसे, जिन्होंनें पहाड को केवल चित्रों-चलचित्रों में ही देखा था/है। पीढियों से झेल रहे इस दंश को लोगों नें संकल्प के साथ सडकों पर जमकर संघर्ष किया और तब तक मैदान नहीं छोडा जब तक इसमें सफलता नहीं मिली, चाहे उन्हें कोदा-झंगोरा ही खाना पड जाय, इसका आशय यह कतई नहीं था, की यहाॅ के राजनेता और नीति-नियंता लोगों को कोदे-झंगोरे से भी नीचे का जीवन-यापन कराने को मजबूर करा दें ? पहाड के मूल पर प्रश्नों पर सत्ता का मौंन वाकई आश्चर्य में डालनें वाला है, जिन खेत-खलियानों में कोदा-झंगोरा उगाया जाता रहा, वह भी इन निकम्मी सरकारों के अदूरदर्शी फैसलों नें चोपट कर दिया, जंगली जानवरों, बंदरों, सुअरों का आतंक इस कदर फैला हुआ है, की खेत-खलियानो ंकी बात छोड दीजिए, वे घर के अंदर में पका-पकाया खाना भी चट कर जा रहे हैं, आनें वाले दिनों में ये आदमखोर, बच्चों-महिलाओं और कमजोर असहायों को भी अपना निवाला बना दे ंतो भी कोई आश्चर्य नहीं होगा ? नेताओं का इतना बडा अंहकार जब वे सत्ता में पहुॅचते ही राजशाही जैसे हुक्म चलानें लगते हैं ? यही कारण है कि पहाड के भोले-भाले लोग इतनें नाराज कभी नहीं हुए जितनें अब हैं। ब्यूरो आॅफ पुलिस रिसर्च एण्ड डवलपमैंण्ट (एन0सी0आर0बी0) नें पिछले सत्रह सालों में हुए आॅदोलनों का जो ब्यौरा प्रस्तुत किया है वे चैंकानें वाले हैं,  2016 तक जुटाऐ गये आॅकडों के अनुसार प्रदेश में आॅदोलनों की संख्या 22,000 (बाइस हजार) है, जो की देश का सबसे बडा आॅकडा है, इसमें भी वे राज्य कर्मचारियों की भागीदारी सर्वाधिक है (5,838) जो राजकोष से पगार लेते हैं, 1,384 छात्र आॅदोलन हैं, और 3,212 बार श्रमिक वर्गों नें अपनीं माॅगों के लिए आॅदोलन किया।  अब सबसे बडा सवाल उठता है, की, इतनें छोटे वक्त में इस शान्तप्रिय प्रदेश में इतना अंसन्तोष क्यों ? अगर संघर्ष और आॅदोलनों का दौर यदि खत्म नहीं होंना था तो, फिर इस नये गठन के औचित्य पर भी सवाल खडे होंनें लाजमी है। इन आॅदोलनों के साइड-इफैक्ट के कोई प्रमाणिक आॅकडे यदि उपलब्ध ना भी हों, तो भी यह अनुमान लगाना बेहद सहज है, की इससे राज्य के विकास को कितना ज्यादा नुकसान झेलना पड रहा है ? इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। खासकर जिस राज्य नें अभी-अभी चलना शुरू किया हो, तथापि जिस राज्य के संसाधन इतनें कमजोर हों, खडा होंनें के लिए काफी ताकत की आवश्यकता है ? राज्य के तमाम तबकों/वर्गों का सडकों पर आनें का मतलब यही है, की सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है ?
जिस राज्य की कल्पना में जनता नें पहले ही स्वीकार कर दिया हो, की राज्य के संसाधन बेहद सीमित हैं, फिर, उसमें एक समान विकास नीति अपनाई जानीं चाहिए थी,यानि की सबसे पहले राज्य के संसाधनों को विकसित किया जाना चाहिए। उत्तराखण्ड में पर्यटन, तीर्थाटन व खेती-किसानी के लिए माहौल बनाया जाना चाहिए, जिससे गरीब से गरीब आदमी का पेट भरा जा सके, और पलायन जैसी भयावह समस्या से निजात मिल सके। लेकिन राज्य के नीति-निर्धारकों को कभी पहाड की वास्तविक समस्याओं से वास्ता नहीं रहा, सच कहें तो पूर्व प्रान्त उत्तर प्रदेश से पोषित-प्रशिक्षित इन राजनेताओं नें पहाड को कभी ठीक ढंग से समझनें का प्रयास ही नहीं किया, अपितू उत्तर प्रदेश के ’राजनीतिक कल्चर’ पहाडवासियों पर थोपनें का लगातार प्रयास हुआ। इसी प्रकार की अदूरदर्शी नीतियों और झूठे आश्वासनों के चलते  लोंगों को सपनें तो दिखाऐ पर पूरे कभी नहीं किये, कारण लोंगों में असन्तोष इस कदर फैला है की वे असन्तुष्ट जीवन यापन करनें को मजबूर हैं, और आॅदोलनों का दौर आगामी दिनों बढेगा पर कम नहीं होगा।     
आखिर इन पहाडी नाजूक पगडंडियों पर चलते-चलते यहाॅ के जनमानस नें कई पीढियाॅ गुजार दी थी, जहाॅ उसके नसीब में एक सामान्य जीवन निर्वाह के लिए भी दर-दर भटकने के सिवाय कुछ भी नहीं रहा ? अतः इस पहाडी क्षेत्र को ’राज्य’ के रूप में देखने का, उसका सपना भी था और समाधान भी।  इस सपनें को हासिल करनें के लिए यहाॅ के हर घर के वाशिदंे नें सडकों पर आ कर मोर्चा लिया, और आखिरी जंग तक का सफर तय किया, इसलिए की रोजमर्रा के जीवन और आवश्यकताओं के लिए उसे फिर सडकों पर न आना पडे ? इसके लिए लोगांे नें अपनें व्यवसाय,नौकरी यहाॅ तक जीवन को भी को दाॅव पर लगा दिया, ऐसे कई घर और परिवार है जिन्होनें नें इस लडाई में अपना सब कुछ खो दिया, कईयों नें अपनें घर के एक मात्र चिराग की ही तिलांजलि दे दी, कई माताओं की गोद सूनीं हो गई, सुहागिनों की माॅग उजडी । 
 वैसे भी ़दूर्भाग्य से इस क्षेत्र का एक लम्बा इतिहास ’आॅदोलनों’ की भेंट चढा। जीवन से जुडी तमाम हर छोटी-बडी जरूरतों के लिए लोग सडकों पर आते रहे हैं, यहाॅ तक की सदियों से हमारे पुरखों ने जिस प्राकृतिक सम्पदा (खासकर वन संपदा) को अपनें बच्चों की तरह पाल- पोसकर सम्भाला/बडा किया, सरकार, और उसके पाले ठेकेदारों की ललचाई नजरों नें उसको भी नही बख्सा ? चिपको आॅदोलन जो हमारी मातृ शक्ति की गौरव-गाथा को स्मरण कराता है, अनपढ और भोली-भाली ग्रामीण महिलाओं नें अपनी प्राकृतिक वन संपदा की रक्षा जिस बाहदुरी और आत्मविश्वास से किया वह आज और कल की पीढी के लिए प्रेरणा स्रोत रहेगा ? इसी तरह सडक, बीजली, पानी से लेकर  शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी अतिमहत्वपूर्ण व निहायत जरूरतों के लिए भी सरकारों से बिना दो-दो हाथ किऐ नहीं मिला ? अंत में राज्य के निवासियों नें जीवन की तमाम जरूरतों के समाधान के रूप में इस क्षेत्र को राज्य के रूप में प्राप्त करनें के लिए लम्बी लडाई लडी और जीत के बाद उम्मीद थी की जिस संघर्ष से उसे राज्य मिला उसी सिद्दत से उसे राज्य में हिस्सेदारी भी मिलेगी, हिस्सेदारी रोजगार की, शिक्षा की बीजली, पानी, स्वास्थ्य और जीवन को आगे बढानें की सुविधाओं की ? 
लेकिन धरतीपूत्रों की करामात देखिये की सत्ता पाते ही उनकी चाल, चरित्र और व्यवहार  भी बदल गया जिस उंत्तराखण्ड को कोदा-झंगोरा और कंडाली खाकर बनानें और संवारनें की बातंे हो रही थीं, उन्हीं हुक्मरानो की आवाज लडखडानें लगी है  आज तो हालात ये हो गये हैं की आधा से ज्यादा पहाड खाली हो गया है जिन खेतों में कभी कोदा-झंगोरा बोया-उगाया जाता था, जंगली-जानवरों, बंदर, सुअंरों,भालू के आतंक से नष्ट होंनें की कगार पर है ? ये राजनीति और हुक्मरानों की ही घटिया सोच का परिणाम है की आज गाॅवों में बचे-खुचे लोगों नें भी खेती-किसानी के साथ-साथ पहाड की परम्परा, अस्मिता और संस्कृति का परित्याग कर दिया है, अब गाॅवों में मंागल गीतों की जगह शराब-डीजे की मस्ती में लोग झूमते हुए नजर आते है ?  हुक्मरानों की उल्टी-सीधी  नीतियों का ही नतीजा है की आज गाॅवों में बसे बचे-खुचे लोग भी खेतों-खलिहानों के बजाय राशन की दुकानों की तरफ ताकते रहते हैं, जिस पहाडी कौंम नें कभी इन पथरीली चट्टानों को काटकर समतल खेतों का निर्माण किया था, आज उन्हीं के वारिशों को चंद रूपयों का लालच देकर उन्हें खरीदा जा रहा है। कई ऐसी सुविधाऐं जिन्हें ’मुफ्त’ के नाम पर जनता के लिए खेला गया जिसका नतीजा आम लोंग निकम्मेपन’ का शिकार हो गये हैं।  लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के नाम पर सरकारों के पास कोई ’विजन’ नाम की कोई चीज ही नहीं है ?
सरकारी मशीनरी का सबसे बडा तबका जिन्हें आम लोंगों की ’सेवा’ में लगाया था, उनका असंन्तोष आसमान पर है, ट्रांसफर-पोस्टिंग और लेकर राज्य कर्मचारियों एक वर्ग हमेशा से ही सडकों पर होता है ? फिर अब उम्मीद किससे की जाय ? नतीजन सत्रह सालों के इतिहास को परत-दर-परत खोंलें तो राज्य के निवासियों के खाते में आॅदोलनों का ब्यौरा ही नसीब होगा, अब एक बडा सवाल खडा होता हे की जब वही सब ’कुछ होंना’ था तो फिर राज्य के लिए लडी गईं कुर्बानियों का क्या होगा ? उन सपनों का क्या होगा जो पहाड के इस राज्य वासी नें देखा था ? अब जब सत्रह सालों के इस राज्य में सबसे बडी उपलब्धि के नाम पर ’आॅदोलन’ ही है, जो सत्ताधीशों की कार्यशैली पर बडा प्रश्न खडा कर देता है।    

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