समाज के कमजोर तबके से जुड़े क्षेत्र में विकास के काम किए जाने वाली योजना में बजट होने के बावजूद रक़म खर्च न की जा सके तो इसे क्या कहा जाएगा… लापरवाही या नालायकी? उत्तराखंड के कई विभाग ऐसे हैं जो अनुसूचित जाति उपयोजना और अनुसूचित जनजाति उपयोजना के तहत बजट पर कुंडली मारकर बैठे रहे और बजट सरेंडर करने की नौबत आ गई.
उत्तराखंड सचिवालय में बुधवार को एक ऐसा खुलासा हुआ जिससे कई सरकारी विभागों के फिसड्डी होने की बात पर मुहर लग गई. दरअसल अपर मुख्य सचिव रणवीर सिंह ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति क्षेत्र में विकास कार्यों से जुड़ी उप योजना के तहत बजट की स्थिति जानने के लिए समीक्षा बैठक बुलाई थी.
इसमें पता चला कि प्रदेश के अलग-अलग विभाग लगभग साढ़े सात करोड़ की धनराशि खर्च नहीं कर पाए हैं. यह हाल तब है जब इस योजना के तहत खर्च के लिए बाकायदा उत्तराखंड में अलग से अधिनियम बना है.
उत्तराखंड में उप योजना के तहत विकास कार्य करने वाले लगभग सभी विभागों के लिए एससीएसपी यानि अनुसूचित जाति उपयोजना और टीएसपी यानि अनुसूचित जनजाति उपयोजना के नियोजन धन आवंटन और उपयोग के लिए अधिनियम लागू है. बजट की धनराशि का हिस्सा आबादी के हिसाब से खर्च के लिए तय किया गया है लेकिन प्रदेश के कई विभाग ऐसे हैं जो धनराशि खर्च नहीं कर पाए.
सहकारिता विभाग एससीएसपी टीएसपी योजना के तहत एक करोड़ 20 लाख रुपये की रकम खर्च नहीं कर पाया. युवा कल्याण विभाग भी 70 लाख के बजट पर कुंडली मारकर बैठ गया है. तकनीकि शिक्षा विभाग 2 करोड़ और चिकित्सा विभाग 4 करोड़, 6 लाख रुपये खर्च नहीं कर पाया जिसे सरेंडर करने की तैयारी है.
अपर मुख्य सचिव रणवीर सिंह ने न्यूज 18 से एक्लक्लूसिव बातचीत में कहा कि जो विभाग धनराशि खर्च नहीं कर पाये हैं उनसे सरेंडर करने के लिए कहा जा रहा है ताकि इस धनराशि को कहीं और खर्च किया जा सके.
उत्तराखंड में अलग-अलग सरकारी विभागों को इस योजना के तहत साल 2017-18 के लिए लगभग तेरह सौ करोड़ के बजट का प्रावधान किया गया था लेकिन कई विभाग खर्च में फिसड्डी साबित हो रहे हैं और धनराशि सरेंडर करने की नौबत आ गई है. बहरहाल सवाल यह है कि सरकारी सिस्टम आखिर क्यों सुधरने का नाम नहीं ले रहा.


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