उत्तराखंड की अस्थाई राजधानी देहरादून घाटी में बसा एक ख़ूबसूरत शहर है और इसकी सुंदरता बरसों से लोगों को अपनी ओर खींचती आई है. महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी जैसे बड़े नाम उस लंबी सूची में शामिल हैं जिन्हें यहां की वादियां और आबोहवा बेहद पसंद रही है. लेकिन यह सब बदल रहा है.
देहरादून की ख़ूबसूरत वादियों, शुद्ध हवा के साथ यहां के बासमती चावल, लीची, चाय के बड़े बागान मशहूर हुआ करता था. लेकिन जिन चीज़ों के यह शहर जाना जाता था राज्य बनने के बाद विकास की अंधी दौड़ में वह खो गई हैं.
17 साल पहले बने उत्तराखंड राज्य की अस्थाई राजधानी बनने के साथ ही शहर की आबादी में एकाएक उछाल आया और बासमती के खेत, लीची, आम और चाय के बागानों की जगह कंक्रीट के जंगल लेने लगे. साल में कई टन बासमती चावल का उत्पादन करने वाले कृषक आज खुद अपने लिए ही चावल नहीं उगा पा रहे हैं. बासमती तो दूर अब देहरादून की लीची और आम भी सिर्फ नामभर के लिए रह गए है.
हेस्को के संस्थापक पर्यावरणविद अनिल जोशी कहते हैं कि यह शहर जिन चीज़ों के लिए मशहूर था वह ख़त्म सी हो रही हैं और इसका बड़ा कारण सड़कों पर वाहनों की भीड़ और लगातार होने वाले निर्माण कार्यं से उड़ने वाली धूल है.
देहरादून पर जनसंख्या का भार भी बेतहाशा बढ़ा है. जिले में जनसंख्या 2001 में 12,82,143 थी तो 2011 के अनुसार यह 16,96,694 जो लगातार बढ़ रही है. शहर का व्यवस्थित रखने का ज़िम्मा एमडीडीए का था लेकिन वह नेताओं की खींचतान और भ्रष्टाचार के मामलों में उलझकर रह गया और शहर बेतरतीब फैलता गया.
अपनी आबोहवा के लिए देश-दुनिया से पर्यटकों को खींचने वाले देहरादून की हवाओं में ज़हर घुल गया है यानि कि शहर की आत्मा पर ही संकट है.... अगर अब भी राज्य सरकारों ने विकास के नाम पर यहां अनियंत्रित निर्माण कार्यों को रोका नहीं तो डर है कि यह शहर यहां रहने वालों के लिए भी नर्क बन जाएगा.


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