तीर्थ नगरी ऋषिकेश मैं गुरु पूर्णिमा पर शिष्यों ने गुरु की पूजा कर लिया गुरु मंत्रगुरु मंत्र में मनुष्य के कल्याण का मार्ग छिपा होता है -हंस देवाचार्यऋषिकेश,27जुलाई। तीर्थ नगरी ऋषिकेश में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर समान आश्रमों में पहुंचे देश-विदेश से श्रद्धालुओं ने प्रातः गंगा स्नान कर अपने गुरुओं का श्रद्धा पूर्वक पूजा अर्चना कर उनके पति अपनी श्रद्धा अर्पित की वही गुरुओं ने नए शिष्यों को गुरु मंत्र देकर शिष्य परंपरा में उन्हें शामिल किया जिसके अंतर्गत जगन्नाथ आश्रम जयराम आश्रम कृष्ण कुंज आश्रम सहित तमाम आश्रमों में श्रद्धालुओं की भारी भरकम भीड़ रही तो वहीं आज सभी का सबसे बड़ा चंद्र ग्रहण होने के कारण लगे 2:00 बजे बाद से सूचक के चलते श्रद्धालुओं ने अपने अपने गुणों का प्रातः सही पूजन करना प्रारंभ कर दिया था इस दौरान जयराम आश्रम में ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी के निर्देशन में पंडित माया राम ने नए कर्मचारियों का जनेऊ संस्कार भी करवाया मनीराम मार्ग स्थित जगन्नाथ आश्रम में रामानुजाचार्य स्वामी हंस देवाचार्य ने गुरु पूर्णिमा का महत्व बताते हुए कहां की गुरु मंत्र मनुष्य के कल्याण का मार्ग है गुरू पूर्णिमा में गुरू के अर्थ के अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश देने वाला कहा गया है. क्योंकि गुरु द्बारा दिये जाने वाले मंत्र हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले होते हैं. गुरु की भक्ति में कई श्लोक रचे गए हैं जो गुरू की सार्थकता को व्यक्त करने में सहायक होते हैं. गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार संभव हो पाता है और गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं हो पाता.उन्होंने कहा कि भारत में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है. प्राचीन काल से चली आ रही यह परंपरा हमारे भीतर गुरू के महत्व को परिलक्षित करती है. पहले विद्यार्थी आश्रम में निवास करके गुरू से शिक्षा ग्रहण करते थे तथा गुरू के समक्ष अपना समस्त बलिदान करने की भावना भी रखते थे, तभी तो एकलव्य जैसे शिष्य का उदाहरण गुरू के प्रति आदर भाव एवं अगाध श्रद्धा का प्रतीक बना जिसने गुरू को अपना अंगुठा देने में क्षण भर की भी देर नहीं की.हंसदेवाचार्य ने कहा कि गुरु पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह उच्चवल और प्रकाशमान होते हैं उनके तेज के समक्ष तो ईश्वर भी नतमस्तक हुए बिना नहीं रह पाते. गुरू पूर्णिमा का स्वरुप बनकर आषाढ़ रुपी शिष्य के अंधकार को दूर करने का प्रयास करता है. शिष्य अंधेरे रुपी बादलों से घिरा होता है जिसमें पूर्णिमा रूपी गुरू प्रकाश का विस्तार करता है. जिस प्रकार आषाढ़ का मौसम बादलों से घिरा होता है उसमें गुरु अपने ज्ञान रुपी पुंज की चमक से सार्थकता से पूर्ण ज्ञान का का आगमन होता है.वहीं जयराम आश्रम के पीठाधीश्वर ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी गुरु शिष्य की परंपरा को रेखांकित करते हुए कहा कि गुरू आत्मा - परमात्मा के मध्य का संबंध होता है. गुरू से जुड़कर ही जीव अपनी जिज्ञासाओं को समाप्त करने में सक्षम होता है तथा उसका साक्षात्कार प्रभु से होता है. हम तो साध्य हैं किंतु गुरू वह शक्ति है जो हमारे भितर भक्ति के भाव को आलौकिक करके उसमे शक्ति के संचार का अर्थ अनुभव कराती है और ईश्वर से हमारा मिलन संभव हो पाता है. परमात्मा को देख पाना गुरू के द्वारा संभव हो पाता है. इसीलिए तो कहा है , गुरु गोविंददोऊ खड़े काके लागूं पाय. बलिहारी गुरु आपके जिन गोविंद दियो बताये। मायाकुण्ड स्थित कृष्ण कुंज आश्रम में उत्तराखंड पीठाधीश्वर स्वामी कृष्णाचार्य मैं भी अपने शिष्य को गुरु व शिष्य के बीच का संबंध किस प्रकार होना चाहिए उस पर विस्तार पूर्वक जानकारी दें तो वहीं गीता आश्रम में स्वामी स्वधर्मानंद तथा कैलाश व्यक्तित्व हरि हर तीर्थ में स्वामी प्रेमानंद जी महाराज के यहां गुरु पूर्णिमा पर्व धूमधाम से मनाया गया
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गुरु ही आत्मा से परमात्मा को मिलाने का संबंध स्थापित करता है : ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी

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