मात्र 15 किमी से शुरू हुआ सफर आज 300 किमी तक पहुंचा
ऋषिकेश। गढ़वाल की लाइफलाइन गढ़वाल मोटर बस सेवा 75 वर्ष की हो गई। हमारी पहाडों की धडकन जीएमओ की बस सेवा मात्र 15 किमी के सफर से शुरू होकर आज लगभग 350 किमी तक का सफर तय कर रही है।
कुछ बाते इसके सफर की करते हैं। 1943 के दौर मे हिन्दूस्तान आजाद नहीं था तब जीएमओ की नींव पड गई थी।
शुरूआत मे कोटद्वार से दुगड्डा का 15 किमी का सफर शुरू किया। शायद 6 या 7 गाड़ियों से तब शेवरले कम्पनी की 7 शीटर बस चलती थी। शुरू मे जीएमओ का नाम कुछ और था उस समय इनको टक्कर देने के लिए एक व्यक्तिगत गाड़ी भी चली लेकिन आमसौड़ के पूल के आसपास उस गाडी का दुर्घटना हो गई। ये इस रोड की पहली घटना थी गाडी वाले ने फिर कोशिश की लेकिन बाद में जीएमओ से हार गया।
पहाड़ों में रोड का जाल बिछता गया। जीएमओ की सेवा बढती गई । आज श्री बद्रीनाथ तक लगभग 300 किमी तक का सफर हो गया।
इसके चलते कूमाॅऊ में केएमवीएन और शायद टिहरी में भी बस कम्पनी भी बन गई। जीएमओ और अन्य बस कम्पनियों ने फिर परिवहन विभाग से संचालन के लिए गाडियों के रंग लिये। जिसमें जीएमओ को लाल रंग मिला। धीरे-धीरे काफिला बढता गया और संख्या इकाई से सैकडों मे पहुँच गई।
एक समय तो जीएमओ के काफिले में 800 गाड़ियां तक हो गई थी। आज 400-500 के ऑकडे मे अभी भी है।
जीएमओ कम्पनी यात्रियों को उत्तम सेवा देने के लिए प्रयास भी करती रहती है।
एक बार जीएमओ को सेट नंबर मे भी बांटा गया। सभी मार्गों में डाक सेवा भी जीएमओ को हिमगिरि सेवा भी दी गई।
निर्धारित समय में स्टेशन से निकलना। जीएमओ के द्वारा नेक कार्य भी किये गये। माँ ज्वाला देवी के मुख्य द्वार का निर्माण किया। आपदाओं में भी खाद्य सामग्री व अन्य सामान भी बांटे है और मुख्य बात आये दिन कही ना कहीं कोई जरूरत मंद को सफर का आनंद ले लेता है । स्कूल के बच्चों को लिए भी बस सेवा कुछ अच्छा ही करती है।
गढ़वाल में शादी व शुभकार्यो की हमेशा से गवाह रही है।
ऋषिकेश। गढ़वाल की लाइफलाइन गढ़वाल मोटर बस सेवा 75 वर्ष की हो गई। हमारी पहाडों की धडकन जीएमओ की बस सेवा मात्र 15 किमी के सफर से शुरू होकर आज लगभग 350 किमी तक का सफर तय कर रही है।
कुछ बाते इसके सफर की करते हैं। 1943 के दौर मे हिन्दूस्तान आजाद नहीं था तब जीएमओ की नींव पड गई थी।
शुरूआत मे कोटद्वार से दुगड्डा का 15 किमी का सफर शुरू किया। शायद 6 या 7 गाड़ियों से तब शेवरले कम्पनी की 7 शीटर बस चलती थी। शुरू मे जीएमओ का नाम कुछ और था उस समय इनको टक्कर देने के लिए एक व्यक्तिगत गाड़ी भी चली लेकिन आमसौड़ के पूल के आसपास उस गाडी का दुर्घटना हो गई। ये इस रोड की पहली घटना थी गाडी वाले ने फिर कोशिश की लेकिन बाद में जीएमओ से हार गया।
पहाड़ों में रोड का जाल बिछता गया। जीएमओ की सेवा बढती गई । आज श्री बद्रीनाथ तक लगभग 300 किमी तक का सफर हो गया।
इसके चलते कूमाॅऊ में केएमवीएन और शायद टिहरी में भी बस कम्पनी भी बन गई। जीएमओ और अन्य बस कम्पनियों ने फिर परिवहन विभाग से संचालन के लिए गाडियों के रंग लिये। जिसमें जीएमओ को लाल रंग मिला। धीरे-धीरे काफिला बढता गया और संख्या इकाई से सैकडों मे पहुँच गई।
एक समय तो जीएमओ के काफिले में 800 गाड़ियां तक हो गई थी। आज 400-500 के ऑकडे मे अभी भी है।
जीएमओ कम्पनी यात्रियों को उत्तम सेवा देने के लिए प्रयास भी करती रहती है।
एक बार जीएमओ को सेट नंबर मे भी बांटा गया। सभी मार्गों में डाक सेवा भी जीएमओ को हिमगिरि सेवा भी दी गई।
निर्धारित समय में स्टेशन से निकलना। जीएमओ के द्वारा नेक कार्य भी किये गये। माँ ज्वाला देवी के मुख्य द्वार का निर्माण किया। आपदाओं में भी खाद्य सामग्री व अन्य सामान भी बांटे है और मुख्य बात आये दिन कही ना कहीं कोई जरूरत मंद को सफर का आनंद ले लेता है । स्कूल के बच्चों को लिए भी बस सेवा कुछ अच्छा ही करती है।
गढ़वाल में शादी व शुभकार्यो की हमेशा से गवाह रही है।


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