ऋषिकेश। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश में डिपार्टमेंट ऑफ ट्रॉमा सर्जरी की ओर ट्रॉमा केयर विषय पर आयोजित एटीएलएस व एटीसीएन नेशनल वर्कशॉप के दूसरे दिन विषय विशेषज्ञों ने प्रतिभागी चिकित्सकों को दुर्घटना में बुजुर्ग व्यक्तियों, गर्भवती महिलाओं व आग से झुलसे मरीजों के उपचार संबंधी जानकारियां दी। ऐसे मौके पर इलाज में बरती जाने वाली आवश्यक सावधानियों से प्रतिभागियों को विस्तारपूर्वक अवगत कराया गया। इस दौरान विशेषज्ञों ने दुर्घटना में दुपहिया वाहन सवारों के गंभीर चोटिल होने व इसमें सिर की चोट से होने वाली मौतों के ग्राफ को कम करने के लिए हेलमेट के उपयोग को नितांत जरुरी बताया। रविवार को कार्यशाला के दूसरे दिन अपने संदेश में एम्स निदेशक पद्मश्री प्रोफेसर रवि कांत ने बताया कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में प्राकृतिक आपदाओं, तकनीकि खराबी व मानवीय लापरवाही से होने वाली दुर्घटनाएं आम बात है। ऐसी स्थिति में राज्य में कार्यरत चिकित्सकों व नर्सिंग कर्मचारियों का ट्रॉमा केयर में दक्ष होना अत्यंत आवश्यक है। निदेशक पद्मश्री प्रो. रवि कांत ने बताया कि इसी के मद्देनजर दिल्ली एम्स के बाद ऋषिकेश एम्स में भी एटीएलएस व एटीसीएन प्रशिक्षण कोर्स को जरुरी कर दिया गया है, जिसमें दुर्घटनाओं में सिर की गंभीर चोट,स्पाइन इंजरी, प्रेगनेंसी ट्रॉमा आदि विषयों के कौशल प्रशिक्षण पर जोर दिया गया है। निदेशक एम्स प्रो. रवि कांत ने बताया कि आपदाओं व बड़ृी दुर्घटनाओं की स्थितियों से निपटने व सेवाएं देने के लिए ऋषिकेश एम्स चिकित्सकीय तौर पर पूरी तरह से तैयार व बचनबद्ध है। कार्यशाला के तहत दिल्ली एम्स के पूर्व निदेशक प्रो. एमसी मिश्रा ने दुर्घटना में घायल गंभीर मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करते वक्त रखी जाने वाली आवश्यक सावधानियों और मरीज को भेजने व रिसीव करने वाले चिकित्सक की जिम्मेदारी व उनके मध्य पारस्परिक संवाद स्थापित करने पर जोर दिया, जिससे मरीज के उपचार में होने वाली किसी भी प्रकार की चूक से बचा जा सके। इस अवसर पर केजीएमयू लखनऊ के प्रो. समीर मिश्रा ने दुर्घटना में सिर पर लगने वाली गंभीर चोटों पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि देश में अधिकांश दुर्घटनाओं में बिना हेलमेट के दुपहिया वाहन चलाने वाले सवार सिर की गंभीर चोट से ग्रस्त होते हैं। कईबार ऐसे मरीज ठीक तो हो जाते हैं मगर अधिकांश हैडइंजरी के शिकार रोगी के उपचार से पड़ृने वाले आर्थिक बोझ से परिवार, सोसाइटी पर भारी पड़ने लगते हैं। ऐसे मरीजों की देखरेख में परिवार के एक से अधिक सदस्यों को जुटना पड़ता है। लिहाजा कुछ सावधानियों व नियमों का पालन करने से ऐसी गंभीर स्थितियों से बचा जा सकता है। कार्यशाला में एटीएलएस विशेषज्ञ सफदरजंग हास्पिटल की डा. निक्की सभरवाल, एम्स दिल्ली की ट्रॉमा सर्जरी प्रमुख प्रो. सुषमा सागर, एम्स ऋषिकेश के डा. मनु मल्होत्रा ट्रॉमा लाइफ सपोर्ट पर व्याख्यानमाला प्रस्तुत की। कार्यशाला के आयोजन में ट्राॅमा सर्जरी विभागाध्यक्ष प्रो. मोहम्मद कमर आजम, डा. अमूल्य रतन, नर्सिंग की ओर से डा. राजेश कुमार व मेडिकल एजुकेशन विभागाध्यक्ष प्रो. शालिनी राव ने अहम भूमिका निभाई।
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योग, गंगा स्नान, वाॅटर ब्लेसिंग सेरेमनी कर जल संरक्षण का लिया संकल्प
वल्र्ड हेल्थ डे पर परमार्थ निकेतन आश्रम में चलाया स्वच्छता अभियान
यूरोलाॅजी के साथ-साथ वाॅटरलाॅजी को भी आगे बढ़ाये-स्वामी चिदानन्द सरस्वती
7 अप्रैल, ऋषिकेश। वल्र्ड हेल्थ डे के अवसर पर परमार्थ निकेतन में भारत के विभिन्न प्रातों से आये यूरोलाॅजी विशेषज्ञों ने योग, आसन और ध्यान का अभ्यास किया। तत्पश्चात परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों ने वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ सभी चिकित्सकों ने गंगा स्नान किया।
50 से अधिक यूरोलाॅजी विशेषज्ञ जोलीग्रांट हास्पिटल में अपनी 3 दिवसीय कार्यशाला हेतु देश के विभिन्न प्रांतों से आये हुये है। आज कार्यशाला के समापन अवसर पर जोलीग्रांट के यूरोलाॅजीस्ट डाॅ मनोज विश्वास के नेतृत्व में इस दल के सदस्यों ने परमार्थ निकेतन का भ्रमण किया साथ ही सुश्री गंगा नन्दिनी त्रिपाठी के मार्गदर्शन में योग, ध्यान और आसनों का अभ्यास किया।
परमार्थ निकेतन के सेवकों एवं चिकित्सकों ने वल्र्ड हेल्थ डे के अवसर पर हर व्यक्ति को हर जगह हेल्थ केयर मिले। हर व्यक्ति को बेहतर स्वास्थ्य सुविधायें मिले तथा बीमार होने पर हर जगह अच्छा इलाज उपलब्ध हो सके विषय पर विस्तृत चर्चा की। स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी बेहतर स्वास्थ्य के लिये स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त वातावरण बनाने का आह्वान अक्सर करते है। उनका मानना है कि हेल्थ केयर आवश्यक है परन्तु उससे पहले हमें स्वच्छ जल, स्वच्छ पर्यावरण पर ध्यान देने की जरूरत है।
मनुष्य की किडनी भी तभी अच्छे से कार्य कर सकती है जब शरीर को प्र्याप्त मात्रा में जल मिले और पृथ्वी पर जल होगा तभी शरीर को मिलेगा और फिर ही किडनी स्वस्थ रह सकती है अतः जल अत्यंत आवश्यक तत्व है और उसका संरक्षण नितांत आवश्यक है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने विदेश से वल्र्ड हेल्थ डे के अवसर पर भेजे अपने संदेश में कहा कि बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं पर सभी का अधिकार है और शरीर को स्वस्थ रखना नितांत अवश्य है। स्वस्थ रहने के लिये दवाइयों कि नहीं बल्कि प्राकृतिक जीवनशौली, योग और मेडिटेशन की जरूरत है। हमारे शरीर में किडनी को स्वस्थ रखने के लिये शरीर में जल की उपयुक्त मात्रा पर ध्यान देने की जरूरत है। जल ही जीवन है परन्तु दूसरी ओर जल का घटता स्तर है वैश्विक समस्या है अतः जल के संरक्षण के साथ जल के पुनर्चक्रण पर ध्यान देना नितांत आवश्यक है । हम सभी को एक जुट होकर जल संरक्षण के लिये कार्य करना होगा तभी हम भावी पीढ़ियों के लिये जल बचा सकते है। उन्होने सभी यूरोलाॅजी विशेषज्ञों से आह्वान किया कि यूरोलाॅजी के साथ अब वाटॅरलाजी पर भी ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि धरती पर जल का स्तर घटता जा रहा है, एक समय था जब लगभग 10-12 फुट खोदने पर ही जल निकल आता था और आज 500 फुट खोदने पर भी जल नहीं है यह अत्यंत चिंता का विषय है इसलिये हम सब का कर्तव्य बनता है जल का संरक्षण करे।
डाॅ अनिल, अध्यक्ष नार्थ जोन यूरोलाॅजी सोसाइटी ऑफ इंडिया, ने कहा कि यूरोलाॅजी विशेषज्ञ शरीर के प्लंबर है जो शरीर के पानी की पाइपलाइन सिस्टम को स्वस्थ और मजबूत बनायें रखता है।
यूरोलाॅजी विशेषज्ञों के दल के सदस्यों ने कहा कि कार्यशाला का समापन परमार्थ निकेतन के दिव्य वातावरण में हुआ यह वास्तव में अद्भुत अनुभव है। उन्होने योग और ध्यान के मर्म को जानकर प्रसन्नता व्यक्त की। डाॅ मनोज विश्वास से कहा कि मेरे एक निवेदन पर स्वामी जी महाराज ने हमें अपने घर की तरह सुविधायें प्रदान की जिसकी मुझे उम्मीद भी नहीं थी। उन्होने कहा कि परमार्थ निकेतन में हमारा स्वागत रूद्राक्ष के पौधे देकर किया जो हमें हमेशा आतंरिक और बाहृय स्वच्छता बनाये रखने के लिये प्रेरित करते रहेंगे।
परमार्थ निकेतन परिवार के सदस्यों और यूरोलाॅजी विशेषज्ञों के दल ने मिलकर जल संरक्षण का संकल्प लिया साथ ही जल के प्रति विश्व स्तर पर जागरूकता लाने के लिये वाॅटर ब्लेसिंग सेरेमनी सम्पन्न की। इस अवसर पर डाॅ मनोज विश्वास, डाॅ राजीव सूद, डाॅ एच एस भटियाल, डाॅ संजय प्रियदर्शी, डाॅ अनिल, डाॅ संजय गर्ग, डाॅ सुभाष यादव, डाॅ विकास, डाॅ संजय अग्रवाल, डाॅ शैलेन्द्र गोयल, डाॅ पवन केशरवानी, डाॅ योगेश कालरा, डाॅ राजीव करपाल, डाॅ सोनिका अग्रवाल जी, डाॅ सविता यादव, हिमांशु पाण्डेय, डाॅ नीलम वर्मा, डाॅ पवन कुमार और अन्य यूरोलाॅजी विशेषज्ञों ने सहभाग किया।
वल्र्ड हेल्थ डे पर परमार्थ निकेतन आश्रम में चलाया स्वच्छता अभियान
यूरोलाॅजी के साथ-साथ वाॅटरलाॅजी को भी आगे बढ़ाये-स्वामी चिदानन्द सरस्वती
7 अप्रैल, ऋषिकेश। वल्र्ड हेल्थ डे के अवसर पर परमार्थ निकेतन में भारत के विभिन्न प्रातों से आये यूरोलाॅजी विशेषज्ञों ने योग, आसन और ध्यान का अभ्यास किया। तत्पश्चात परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों ने वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ सभी चिकित्सकों ने गंगा स्नान किया।
50 से अधिक यूरोलाॅजी विशेषज्ञ जोलीग्रांट हास्पिटल में अपनी 3 दिवसीय कार्यशाला हेतु देश के विभिन्न प्रांतों से आये हुये है। आज कार्यशाला के समापन अवसर पर जोलीग्रांट के यूरोलाॅजीस्ट डाॅ मनोज विश्वास के नेतृत्व में इस दल के सदस्यों ने परमार्थ निकेतन का भ्रमण किया साथ ही सुश्री गंगा नन्दिनी त्रिपाठी के मार्गदर्शन में योग, ध्यान और आसनों का अभ्यास किया।
परमार्थ निकेतन के सेवकों एवं चिकित्सकों ने वल्र्ड हेल्थ डे के अवसर पर हर व्यक्ति को हर जगह हेल्थ केयर मिले। हर व्यक्ति को बेहतर स्वास्थ्य सुविधायें मिले तथा बीमार होने पर हर जगह अच्छा इलाज उपलब्ध हो सके विषय पर विस्तृत चर्चा की। स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी बेहतर स्वास्थ्य के लिये स्वच्छ और प्रदूषण मुक्त वातावरण बनाने का आह्वान अक्सर करते है। उनका मानना है कि हेल्थ केयर आवश्यक है परन्तु उससे पहले हमें स्वच्छ जल, स्वच्छ पर्यावरण पर ध्यान देने की जरूरत है।
मनुष्य की किडनी भी तभी अच्छे से कार्य कर सकती है जब शरीर को प्र्याप्त मात्रा में जल मिले और पृथ्वी पर जल होगा तभी शरीर को मिलेगा और फिर ही किडनी स्वस्थ रह सकती है अतः जल अत्यंत आवश्यक तत्व है और उसका संरक्षण नितांत आवश्यक है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने विदेश से वल्र्ड हेल्थ डे के अवसर पर भेजे अपने संदेश में कहा कि बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं पर सभी का अधिकार है और शरीर को स्वस्थ रखना नितांत अवश्य है। स्वस्थ रहने के लिये दवाइयों कि नहीं बल्कि प्राकृतिक जीवनशौली, योग और मेडिटेशन की जरूरत है। हमारे शरीर में किडनी को स्वस्थ रखने के लिये शरीर में जल की उपयुक्त मात्रा पर ध्यान देने की जरूरत है। जल ही जीवन है परन्तु दूसरी ओर जल का घटता स्तर है वैश्विक समस्या है अतः जल के संरक्षण के साथ जल के पुनर्चक्रण पर ध्यान देना नितांत आवश्यक है । हम सभी को एक जुट होकर जल संरक्षण के लिये कार्य करना होगा तभी हम भावी पीढ़ियों के लिये जल बचा सकते है। उन्होने सभी यूरोलाॅजी विशेषज्ञों से आह्वान किया कि यूरोलाॅजी के साथ अब वाटॅरलाजी पर भी ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि धरती पर जल का स्तर घटता जा रहा है, एक समय था जब लगभग 10-12 फुट खोदने पर ही जल निकल आता था और आज 500 फुट खोदने पर भी जल नहीं है यह अत्यंत चिंता का विषय है इसलिये हम सब का कर्तव्य बनता है जल का संरक्षण करे।
डाॅ अनिल, अध्यक्ष नार्थ जोन यूरोलाॅजी सोसाइटी ऑफ इंडिया, ने कहा कि यूरोलाॅजी विशेषज्ञ शरीर के प्लंबर है जो शरीर के पानी की पाइपलाइन सिस्टम को स्वस्थ और मजबूत बनायें रखता है।
यूरोलाॅजी विशेषज्ञों के दल के सदस्यों ने कहा कि कार्यशाला का समापन परमार्थ निकेतन के दिव्य वातावरण में हुआ यह वास्तव में अद्भुत अनुभव है। उन्होने योग और ध्यान के मर्म को जानकर प्रसन्नता व्यक्त की। डाॅ मनोज विश्वास से कहा कि मेरे एक निवेदन पर स्वामी जी महाराज ने हमें अपने घर की तरह सुविधायें प्रदान की जिसकी मुझे उम्मीद भी नहीं थी। उन्होने कहा कि परमार्थ निकेतन में हमारा स्वागत रूद्राक्ष के पौधे देकर किया जो हमें हमेशा आतंरिक और बाहृय स्वच्छता बनाये रखने के लिये प्रेरित करते रहेंगे।
परमार्थ निकेतन परिवार के सदस्यों और यूरोलाॅजी विशेषज्ञों के दल ने मिलकर जल संरक्षण का संकल्प लिया साथ ही जल के प्रति विश्व स्तर पर जागरूकता लाने के लिये वाॅटर ब्लेसिंग सेरेमनी सम्पन्न की। इस अवसर पर डाॅ मनोज विश्वास, डाॅ राजीव सूद, डाॅ एच एस भटियाल, डाॅ संजय प्रियदर्शी, डाॅ अनिल, डाॅ संजय गर्ग, डाॅ सुभाष यादव, डाॅ विकास, डाॅ संजय अग्रवाल, डाॅ शैलेन्द्र गोयल, डाॅ पवन केशरवानी, डाॅ योगेश कालरा, डाॅ राजीव करपाल, डाॅ सोनिका अग्रवाल जी, डाॅ सविता यादव, हिमांशु पाण्डेय, डाॅ नीलम वर्मा, डाॅ पवन कुमार और अन्य यूरोलाॅजी विशेषज्ञों ने सहभाग किया।
ऋषिकेश। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश में बुधवार को फैकल्टी डेवलपमेंट प्रशिक्षण कार्यशाला शुरू हो गई।तीन दिवसीय कार्यशाला का एम्स निदेशक पद्मश्री प्रोफेसर रवि कांत ने विधिवत शुभारंभ किया। इस अवसर पर निदेशक एम्स प्रो.रवि कांत ने कहा कि मेडिकल की शिक्षा में नॉलेज पर तो पूरा जोर दिया जा रहा है मगर विद्यार्थियों में स्किल डेवलपमेंट व मरीजों से कैसा व्यवहार किया जाए इस ओर अपेक्षाकृत गौर नहीं किया जा रहा है। एम्स निदेशक पद्मश्री प्रोफेसर रवि कांत ने बताया कि हेल्थ के परिप्रेक्ष्य में चिकित्सक व मरीज के मध्य मतभेद भी मेडिकल स्टूडेंट्स में व्यवहारिक शिक्षा के विकास को नजरअंदाज करने की मुख्य वजह है,लिहाजा इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। निदेशक एम्स प्रो.रवि कांत ने बताया कि बच्चे को सिर्फ किताबी ज्ञान ही नहीं बल्कि व्यवहारिकज्ञान का होना भी नितांत आवश्यक है। कार्यशाला में समन्वयक डा.सौरभ वाष्ण्रेय व डा.गीता नेगी के अलावा डीन नर्सिंग डा.सुरेश के.शर्मा, मेडिकल एजुकेशन विभागाध्यक्ष प्रो.शालिनी राव,डा.अनुपमा बहादुर, डा.मनीषा नैथानी, डा.मनीषा बिष्ट, डा.प्रतिमा गुप्ता ने व्याख्यान दिए। कार्यशाला में पीजी स्टूडेंट्स व फैकल्टी मेंबर प्रतिभाग कर रहे हैं। इस अवसर पर डा.शशि प्रतीक, डा.पीके पांडा,डा.वैंकटेश एस.पाई, डा.मोहित आदि मौजूद थे।
चाय अक्सर गर्म ही पी जाती है और इसमें कोई दो राय नहीं है कि गर्मागर्म चाय पीने का अपना ही मजा होता है। अगर आप भी ऐसा ही सोचते हैं तो जायके तक तो ठीक है लेकिन सेहत के लिहाज से ये सही नहीं है। चाय के कप में आने के कम से कम चार से पांच मिनट बाद इसे पीना सेहत के लिए सही माना जाता है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में भी ये बात सामने आ चुकी है कि ज्यादा गर्म चाय पीने से खाने की नली का या गले का कैंसर होने का खतरा आठ गुना तक बढ़ जाता है।
इस बात की तस्दीक इससे भी की जा सकती है कि ईरान में चाय बहुत अधिक पी जाती है, जबकि वहां के लोग सिगरेट और तंबाकू का सेवन भी नहीं करते थे, लेकिन उनमें इसोफेगल कैंसर की शिकायत बहुत पाई गई। इसके पीछे कारण तेज गर्म चाय थी जो गले के टिशूज को नुकसान पहुंचाती है। चाय को आंच से उतारने के दो मिनट के भीतर पीने वालों को कैंसर का खतरा उन लोगों से पांच गुना बढ़ जाता है, जो चार या पांच मिनट के बाद पीते हैं।
इस बात की रिसर्च के लिए करीब पचास हजार लोगों चुना गया था और उन पर हुए अध्ययन के बाद ये बात सामने आई। विशेषज्ञों के अनुसार चाय पीने और कप में डालने के बीच कम से कम पांच मिनट का अंतर होना चाहिए।
याद रखिए गर्म चाय पीने से एसिडीटी, अल्सर, और पेट से जुड़ी तमाम बीमारियां हो सकती हैं। केवल गर्म चाय ही नहीं, कोई चीज हो इतनी गर्म हो जो पेट की शेल्षा झिल्ली को प्रभावित करती है और उससे पेट से जुड़ी तमाम बीमारियों के होने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए याद रखें कि चीजें इतनी ही गर्म खानी चाहिए जिससे मुंह और गला ही नहीं, पेट भी न जले।
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