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ऋषिकेश। गढ़वाल महासभा द्वारा मायाकुंड स्थित निशुल्क शिक्षण संस्थान उड़ान में अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस पर गोष्ठी का आयोजन किया गया साथ ही इस अवसर पर पुलवामा अटैक पर बनी शॉर्ट फिल्म का लोकार्पण भी किया गया।गोष्ठी को संबोधित करते हुवे अल्फा एकड़मी से जुड़े प्रसिद्ध रंगकर्मी गोविन्द सिंह पंवार ने बताया कि अन्तर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस (World Theatre Day) की स्थापना 1961 में इंटरनेशनल थियेटर इंस्टीट्यूट द्वारा की गई थी उसके बाद से ही हर साल 27 मार्च को विश्वभर में रंगमंच दिवस मनाया जाता आ रहा है। यह दिन उन लोगों के लिए एक उत्सव है जो "थिएटर" के मूल्य और महत्व को देख सकते हैं और सरकारों, राजनेताओं और संस्थानों को जगाने का कार्य कर सकते हैं। इस दिन को मनाने का उद्देश्य दुनिया भर में रंगमंच को बढ़ावा देने और लोगों को रंगमंच के सभी रूपों के मूल्यों से अवगत कराना है। रंगकर्मी डॉ आशुतोष डंगवाल ने कहा कि इस दिवस का एक महत्त्वपूर्ण आयोजन अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संदेश है, जो विश्व के किसी जाने माने रंगकर्मी द्वारा रंगमंच और शांति की संस्कृति विषय पर उसके विचारों को व्यक्त करता है।भारत में रंगमंच का इतिहास बहुत पुराना है।ऐसा समझा जाता है कि नाट्यकला का विकास सर्वप्रथम भारत में ही हुआ।इस मौके पर पुलवामा अटैक पर बनी शॉर्ट फिल्म का गढ़वाल महासभा के अध्यक्ष डॉ राजे नेगी,अल्फा एकेडमी के निर्देशक नवल सेमवाल,आर डी फिल्म्स के निदेशक रविपाल,समाजसेवी विनोद जुगलान ने लोकार्पण किया। गढ़वाल महासभा के अध्यक्ष डॉ नेगी ने कहा कि हम सब लोग एक रंगकर्मी और ये दुनिया एक रंगमच है जिसे सजोए रखना हम सब का कर्तव्य है।इस मौके पर महासभा के प्रदेश महामंत्री उत्तम असवाल,रमेश लिंग्वाल,अभिनव थपलियाल,आदित्य चावला,अंजलि नयाल,मनीषा चौहान,अभय बर्थवाल,मीनाक्षी राना,प्रिया क्षेत्री प्रियंका कुकरेती उपस्थित थे।
देहरादून: उत्तराखंड में हो रहे निकाय चुनाव के लिए राज्य निर्वाचन आयोग ने एक अनोखी पहल की है। इसबार चुनाव में आयोग प्रत्याशियों को स्वच्छता का पाठ भी पढ़ा रहा है। दरअसल, आयोग ने फैसला लिया है कि हर प्रत्याशी को अपने नामांकन पत्र के साथ ही इस आशय का शपथ पत्र भी भरना होगा कि वह चुनाव में प्लास्टिक या पॉलीथिन से बनी किसी तरह की प्रचार सामग्री का इस्तेमाल नहीं करेगा।  

किसी भी शहर को स्वच्छ रखने की पहली जिम्मेदारी, संबंधित नगर निकाय की होती है। लेकिन हम अक्सर देखते हैं कि जिम्मेदार निकाय प्रतिनिधि ही अपनी जिम्मेदारी से निगाह फेर लेते हैं। ऐसे में कैसे शहर स्वच्छ हो ये बड़ा सवाल बनकर रह जाता है। हालांकि अब उम्मीद है कि यही जिम्मेदार प्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारियों का अच्छे से निर्वहन करेंगे और ऐसा हो इसके लिए निर्वाचन आयोग ने भी कमर कस ली है। 

आपको बता दें कि नगर निकाय चुनाव में निर्वाचन से पहले ही राज्य निर्वाचन आयोग ने प्रत्याशियों के लिए साफ शब्दों में गाइडलाइन जारी कर दी है। इस गाइडलाइन के मुताबिक हर प्रत्याशी को अपने नामांकन पत्र के साथ इस आशय का शपथ पत्र भी भरना होगा कि वह चुनाव में प्लास्टिक या पॉलीथिन से बनी प्रचार सामग्री का प्रयोग नहीं करेंगे। नामांकन पत्र में अधिकांश एंट्री लगभग पहले जैसी ही है। इसमें सिर्फ इस नए प्रपत्र को शामिल किया किया है। 

नहीं किया पालन तो होगी कड़ी कार्रवार्इ 

सहायक निर्वाचन अधिकारी (पंचास्थानी चुनावालय) वीएस चौहान ने कहा कि अगर इस शपथ पत्र को भरने के बाद अगर किसी प्रत्याशी ने इसका उल्लंघन किया तो न सिर्फ उन्हें चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है, बल्कि निर्वाचित होने के बाद सदस्यता समाप्त भी की जा सकती है।

शिकायत मिलने पर उठाए जाएं प्रभावी कदम 

वहीं पूर्व मुख्यसचिव एन रविशंकर का कहना है कि निर्वाचन आयोग ने जो पहल की वो अच्छी है। लेकिन सिर्फ पहल करने भर से चीजें व्यवस्थित तरीके से नहीं चलेंगी। इस बात का खास ख्याल रखा जाना चाहिए कि जो ये फैसला लिया गया है इसकी प्रभावी तरीके से मॉनीटरिंग हो और अगर भविष्य में इस प्लास्टिक या पॉलीथिन से बनी सामग्री से प्रचार की कोर्इ शिकायत मिलती है तो उसपर गौरफरमाकर कड़े कदम उठाए जाएं। क्योंकि नियम तो बना दिए जाते हैं लेकिन उनका उल्लंघन करने में कोर्इ भी कसर नहीं छोड़ी जाती है। 

चुनाव प्रचार में होता है पॉलीथिन-प्लास्टिक से बनी सामग्री का अत्याधिक प्रयोग 

पर्यावरण के लिए पॉलीथिन और प्लास्टिक एक बड़ी समस्या बनती जा रही है। इसको देखते हुए प्रदेशभर में पॉलीथिन को पहले ही पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जा चुका है। इसके बाद भी पॉलीथिन का इस्तेमाल चोरी छिपे हो रहा है और हम अक्सर देखते हैं चुनाव प्रचार के लिए इनसे बनी सामग्री का अत्याधिक प्रयोग शुरू हो जाता है। निर्वाचन आयोग ने इसे गंभीर समस्या मानते हुए ये कड़ा कदम उठाया है। 
गोपेश्वर: बदरीनाथ हाइवे पर नासूर बन चुके लामबगड़ भूस्खलन जोन के बार-बार अवरुद्ध होने से देश-दुनिया में यात्रा को लेकर नकारात्मक संदेश जा रहा है। भूस्खलन जोन के स्थायी ट्रीटमेंट को पर्याप्त धनराशि उपलब्ध होने के बाद भी अब तक महज 40 फीसद कार्य ही हो पाया है। जबकि, कार्य पूरा करने के लिए अक्टूबर तक का ही समय शेष है। स्थायी ट्रीटमेंट तो छोडि़ए, एनएच लोनिवि (नेशनल हाइवे लोक निर्माण विभाग) यातायात सुचारू करने में भी नाकाम रहा है।

बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर पांडुकेश्वर से दो किमी आगे लामबगड़ में बीते चार दशक से भूस्खलन जोन सक्रिय है। कई बार तो यह भूस्खलन जोन दुर्घटना का कारण भी बन चुका है। 2013 की आपदा में यहां पर बदरीनाथ हाइवे का 500 मीटर से अधिक हिस्सा अलकनंदा नदी में समा गया था। 

तब बीआरओ (सीमा सड़क संगठन) ने यहां पर अस्थायी मार्ग बनाकर जैसे-तैसे आवाजाही शुरू करवाई थी। 2015 में प्रदेश सरकार ने भूस्खलन जोन सर्वे कराकर इसके स्थायी ट्रीटमेंट के लिए 95.96 करोड़ रुपये की कार्ययोजना तैयार की। 2016 में ट्रीटमेंट के लिए टेंडर निकाले गए और एक जनवरी 2017 से निर्माण एजेंसी मेगा-फेरी कंपनी ने इस पर कार्य भी शुरू कर दिया। अनुबंध के अनुसार ट्रीटमेंट का कार्य 31 अक्टूबर 2018 तक पूरा होना है, लेकिन अब तक 40 फीसद कार्य ही पूर्ण हो पाया है।

दो चरणों में होना है ट्रीटमेंट  

लामबगड़ भूस्खलन जोन का 320 मीटर हिस्सा ऐसा है, जहां निरंतर पहाड़ी दरक रही है। यहां दो चरणों में ट्रीटमेंट कार्य होना है। प्रथम चरण में अलकनंदा नदी के किनारे 500 मीटर लंबी और 26.4 मीटर चौड़ी सड़क का निर्माण किया जा रहा है। 
देहरादून: अक्टूबर में इन्वेस्टर्स मीट में शिरकत करने आ रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केदारनाथ में नई केदारपुरी का लोकार्पण भी कर सकते हैं।  शनिवार को मुख्य सचिव उत्पल कुमार सिंह अचानक केदारनाथ में पुनर्निर्माण कार्यों का जायजा लेने पहुंचे।

इस दौरे को भी प्रधानमंत्री के आगमन से जोड़कर देखा जा रहा है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केदारनाथ के प्रति अगाध श्रद्धा है। केदारनाथ का पुनर्निर्माण उनके ड्रीम प्रोजेक्टस में शामिल है। इस प्रोजेक्ट पर प्रधानमंत्री कार्यालय लगातार नजर रखे हुए है। बीते वर्ष जब  मोदी ने केदारपुरी में पांच परियोजनाओं का शिलान्यास किया था, तब तय किया गया था कि वर्ष 2018 में दीपावली के दौरान प्रधानमंत्री इसका लोकार्पण करेंगे।

अक्टूबर में इन्वेस्टर्स समिट के उद्घाटन के लिए प्रधानमंत्री का दौरा प्रस्तावित है। ऐसे में  चर्चा जोरों पर है कि वह इसी दौरान नई केदारपुरी का लोकार्पण भी कर सकते हैं। चर्चा यह भी है कि नरेंद्र मोदी राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर नौ नवंबर को भी आ सकते हैं।

हालांकि, इसकी कोई अधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। दरअसल, पहले प्रधानमंत्री का केदारनाथ कपाट खुलने के दौरान आने का कार्यक्रम था। बकायदा सरकार ने इसके लिए सभी तैयारियां भी कीं, लेकिन विदेश दौरे के चलते प्रधानमंत्री नहीं पहुंच पाए। इसके बाद प्रधानमंत्री अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर देहरादून आए थे। इस दौरान भी उन्होंने मुख्यमंत्री व मुख्य सचिव से केदारनाथ पुनर्निर्माण कार्य की प्रगति जानी थी। 
चमोली I उत्तराखंड में लोग भले ही बारिश और आपदा से पीड़ित है लेकिन पहाड़ों में कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनके हौसले कुदरत भी तोड़ नहीं पाई. देश की आजादी की 72वीं सालगिरह चमोली जिले के उस गांव में भी मनाई गई जिसने देश की आजादी की लड़ाई से लेकर कारगिल की लड़ाई में अपना योगदान दिया.

चमोली जिले में पहाड़ों की गोद में बसे छोटे से गांव सवाड में आज तक पहुंचा जहां भारी बारिश और खराब मौसम की परवाह किए बिना तिरंगा फहराया गया. स्कूली बच्चों ने स्काउट की ड्रेस में बैंड के साथ देशभक्ति को नारे लगाए और तिरंगा लेकर देश के गीत गुनगुनाए.

चमोली जिले में पहाड़ों के बीच बसा 425 परिवारों वाला सवाड गांव बेहद खास है. इस गांव के हर परिवार ने देश की अलग-अलग युद्धों के लिए नौनिहाल न्योछावर किए हैं. इस गांव के हर घर ने फौजी दिया है जिसने अलग-अलग युद्ध में हिस्सा लिया. शहीदों और सैनिकों की याद में गांव में बने स्मारक पर तिरंगा फहराया गया. भारी बरसात भी इन सेवा नृवित्त जवानों को तिरंगा फहराने से रोक नहीं पाई. सवाड गांव के बेटों ने स्वाधीनता की लड़ाई लड़ी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज का भी हिस्सा रहे, वहीं पहले और दूसरे विश्वयुद्ध में भी कुर्बानी दी.

इस गांव के बेटों ने 1965 और 1971 की जंग में भी दुश्मनों को धूल चटाई. आजादी की लड़ाई से लेकर कारगिल युद्ध में शहादत देने वाले इस गांव के फौजी अब एक नई लड़ाई लड़ रहे हैं जो किसी दुश्मन के खिलाफ नहीं बल्कि सरकार के साथ हैं. ये जंग दो दशक पुरानी है और कागजों के जरिए लड़ी जा रही है. ये लड़ाई सड़क, स्कूल और एक अस्पताल के लिए के लिए है.

गांव के उपप्रधान वीरेंद्र सिंह का कहना है कि उन्होंने सड़क के लिए बहुत गुहार लगाई लेकिन उनकी गुहार किसी ने नहीं सुनी. इस गांव एक फौजी ऐसे भी हैं जिन्होंने 71 की लड़ाई में पाकिस्तानियों के हाथ काट दिए थे लेकिन अब अपने हाथ जब बूढ़े हो गए तो सरकार इनकी सुनती नहीं है. सराड गांव के फौजी अपने गांव के लिए 10 किलोमीटर लंबी बेहतर सड़क, एक केंद्रीय विद्यालय और प्राथमिक इलाज के लिए छोटे से अस्पताल की मांग कर रहे हैं.

उपप्रधान ने आजतक से बातचीत में कहा कि 10 किलोमीटर लंबी सड़क 25 साल पहले बनाई गई थी लेकिन इसकी मरम्मत नहीं होती. सड़क पूरी तरह से टूटी हुई है और इस पर आना-जाना जोखिम भरा है. फौजियों का कहना है कि उनके इंतजार को ढाई दशक बीत गए लेकिन एक बार जो सड़क बनी उसकी मरम्मत दोबारा कभी नहीं हुई. पहाड़ी पर बसे इस गांव तक पहुंचने के लिए 10 किलोमीटर का लंबा सफर नरक यातना जैसा है. बरसात में टूटी-फूटी सड़कें खिसककर खाई में तब्दील हो गई हैं.

फौजियों का कहना है कि सड़क ना होने से गांव के छोटे-छोटे बच्चों की जिंदगी खतरे में पड़ गई है. इन फौजियों ने उत्तराखंड के कई मुख्यमंत्रियों के आगे गुहार लगाई, सरकारी दफ्तरों में याचिका दी लेकिन सुनवाई नहीं हुई. सरकारी स्कूल है लेकिन बेहतर पढ़ाई के लिए वो गांव में एक केंद्रीय विद्यालय चाहते हैं जिसकी मांग सूबे की सरकार को कई बार भेजी जा चुकी है.

इस गांव के फौजियों की समस्या पर हमने इलाके के तहसीलदार एमएल भेतवाल से पूछा तो तहसीलदार साहब ने सफाई दी कि उन्हें समस्या का ज्ञान है लेकिन इलाके में दूसरी जगहों पर बादल फटने की घटना से हुई तबाही से निपटने की चुनौती फिलहाल ज्यादा बड़ी है जिसके बाद वह इस गांव की मांग पर जरूर ध्यान देंगे. तहसीलदार साहब का कहना है कि गांव में अस्पताल और केंद्रीय विद्यालय की मांग के बारे में सूबे के मुख्यमंत्री को भी बताया गया है लेकिन कार्रवाई अभी तक नहीं हो पाई. आजादी के 71 साल बाद भी इस गांव को मूलभूत सुविधाएं नसीब नहीं है. आजादी की 72वीं सालगिरह पर यह फौजी देश की सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि उनके गांव को सड़क स्कूल और एक अस्पताल का तोहफा मिले.
देहरादून: भारतीय जनता पार्टी आगामी लोकसभा चुनाव के लिए कोर्इ कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती है। यही वजह है कि पार्टी में बैठकों का दौर शुरू हो गया है। भाजपा अपने सभी सात मोर्चों की संयुक्त प्रदेश कार्य समिति की बैठक 16 अगस्त को हरिद्वार में करेगी। इसमें आगामी लोकसभा चुनाव में मोर्चों की भूमिका सहित विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा होगी। 
प्रदेश भाजपा मीडिया प्रभारी डॉ. देवेंद्र भसीन ने बताया कि भाजपा के सभी सात मोर्चों जिनमें युवा मोर्चा, महिला मोर्चा, अनुसूचित जाति मोर्चा, अनुसूचित जनजाति मोर्चा, किसान मोर्चा, अन्य पिछड़ा वर्ग मोर्चा और अल्पसंख्यक मोर्चा शामिल हैं की संयुक्त कार्य परिषद की बैठक हरिद्वार में होगी। जिसकी अध्यक्षता भाजपा प्रद्श अध्यक्ष अजय भट्ट करेंगे।
वहीं, प्रदेश महामंत्री संगठन संजय कुमार के हवाले से उन्होंने बताया कि कार्यसमिति में सातों मोर्चों के प्रदेश अध्यक्ष, प्रदेश पदाधिकारी और जिलाध्यक्षों समेत कुल 330 प्रतिनिधि शामिल होंगे। इस दौरान लोकसभा चुनाव में मोर्चों की भूमिका पर चर्चा के साथ ही बूथ स्तर तक मोर्चों को मज़बूती से संगठित करने पर विचार किया जाएगा।

नैनीताल: उत्तराखंड में नैनीताल हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला लिया है। कोर्ट ने फैसला लेते हुए कहा कि अब से फेसबुक पर किसी के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट डालने पर 2 लाख रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा। इसी मामले में कोर्ट ने एक व्यक्ति को 2 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया है।

जानकारी के अनुसार, हाईकोर्ट की एकलपीठ न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह ने मामले की सुनवाई करते हुए रज्य अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग के सचिव जीआर नौटियाल के खिलाफ फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट डालने पर चंद्र शेखर कारगेती पर 2 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। 

बता दें कि जीआर नौटियाल ने मामला दर्ज करवाते हुए कहा था कि कारगेती के द्वारा उनके खिलाफ झूठे, आधारहीन और गलत आरोप वाली पोस्ट फेसबुक पर डाली गई हैं। इससे उन्हें भ्रष्ट अधिकारी साबित करने की कोशिश की गई है।
देहरादून: कांग्रेस के पूर्व विधायक व वर्तमान में बदरी केदार मंदिर समिति (बीकेटीसी) के अध्यक्ष गणेश गोदियाल पर आयकर की कार्रवाई ने सियासी रूप ले लिया है। सोशल साइट्स पर भी यह खबर दिनभर वायरल होती रही, जिसको लेकर हर किसी ने अपने निहितार्थ निकाले।
बदरी केदार मंदिर समिति के अध्यक्ष गणेश गोदियाल पर पांच-छह साल से आयकर के करीब 96 लाख रुपये बकाया चल रहे हैं। इसको लेकर गोदियाल व आयकर विभाग के अपने-अपने तर्क हैं। इसी दिशा में आयकर विभाग ने सामान्य प्रक्रिया के तहत गणेश गोदियाल के बैंक खाते फ्रीज कर दिए। 
हालांकि अब इस प्रकरण ने एक सामान्य कार्रवाई से हटकर सियासी रूप धारण कर लिया है। शुक्रवार दिन पर यह खबर अलग-अलग निहितार्थ लिए सोशल साइट्स पर भी वायरल होती रही। खाते फ्रीज किए जाने पर गणेश गोदियाल का कहना है कि यह कानूनी मामला है और इसे वह उसी ढंग से लड़ेंगे। साथ ही उन्होंने कहा कि वह 25-30 साल से आयकरदाता हैं, मगर कभी भी उन्हें नियमों के उल्लंघन का दोषी नहीं पाया गया। वर्ष 2016 में जब से सरकार बदली है, तभी से विभिन्न सरकारी एजेंसी उनके खिलाफ जांच में जुट गई हैं।
वहीं, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने कहा कि केदारनाथ में जो लेजर शो हुआ था, उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गुणगान किया गया था। इसका बदरी केदार मंदिर समिति के अध्यक्ष होने के नाते गणेश गोदियाल ने विरोध किया था। जो भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध करता है, उसके खिलाफ केंद्र सरकार की एजेंजियां सक्रिय हो जाती हैं। राज्य सरकार भी इन्हें मंदिर समिति के पद से हटाना चाह रही थीं, लेकिन अब यह मामला अदालत में होने के चलते सरकार के हाथ बंध गए हैं। बहरहाल, गणेश गोदियाल पर की गई आयकर की इस कार्रवाई का कांग्रेस पुरजोर विरोध करेगी।
देहरादून: एक ओर जहां सरकारी विद्यालय शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गर्मियों की छुट्टियों के महज 20 दिन बाद शिक्षक नेताओं का आंदोलन शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय को सख्त नागवार गुजरा। बीते हफ्तेभर से क्रमिक अनशन कर रहे राजकीय शिक्षक संघ के शीर्ष नेताओं को शिक्षा मंत्री के निर्देश पर सचिव डॉ भूपिंदर कौर औलख ने शनिवार को सुविधाजनक क्षेत्रों से हटाकर दूरदराज पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानांतरित कर दिया।
संघ के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राम सिंह चौहान और महामंत्री डॉ सोहन सिंह माजिला को देहरादून से क्रमश: टिहरी और नैनीताल जिले में तैनात किया गया है। वहीं चमोली जिले में तैनात संघ के प्रदेश अध्यक्ष कमल किशोर डिमरी को जिले में ही दूरस्थ राजकीय इंटर कॉलेज में भेजा गया है। इस कार्रवाई इसे शिक्षक संगठन में हड़कंप मच गया है। संघ के पदाधिकारियों ने रात्रि में मुख्यमंत्री के दर पर दस्तक दी, लेकिन उन्हें मायूसी ही हाथ लगी है। वहीं संघ ने आंदोलन कार्यक्रम जारी रखने की घोषणा की है।  

ऋषिकेश: केंद्रीय भूतल सड़क एवं परिवहन राज्य मंत्री मनसुुख मंदाविया ने कहा कि सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण चीन बॉर्डर रोड का प्राथमिकता से निर्माण किया जाएगा। इसके अलावा नेपाल, बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार तक सड़क संपर्क बेहतर करने के लिए भी सरकार प्रतिबद्ध है। वर्ष 2024 तक पूरे देश में एक लाख किमी नेशनल हाईवे बनकर तैयार हो जाएगा। 
बीआरओ (सीमा सड़क संगठन) के अतिथिगृह में पत्रकारों से बातचीत के दौरान केंद्रीय राज्य मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार ने ढांचागत विकास के लिये सात लाख करोड़ रुपये का बजट रखा है। जबकि, पिछली सरकार में यह सिर्फ डेढ़ लाख करोड़ था। वर्ष 2014 में भाजपा सरकार बनने से पूर्व कुल 92 हजार किमी सड़कें उसे विरासत में मिली थी। इन चार वर्षों में उसने 34 हजार किमी नेशनल हाईवे का निर्माण किया, जो अगले साल 45 हजार किमी हो जाएगा। वर्ष 2024 तक पूरे देश में एक लाख किमी हाईवे बनाना सरकार का लक्ष्य है। कहा कि पहले प्रतिदिन 11 किमी सड़क बनती थी, जो अब 28 किमी बन रही है। अगले वर्ष इसे बढ़ाकर 45 किमी कर लिया जाएगा।
प्रधानमंत्री की नेपाल यात्रा सड़क विस्तार के बाबत केंद्रीय राज्य मंत्री ने कहा कि सरकार की योजना चार देशों नेपाल, बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार तक सड़क मार्ग विकसित करने की है। हिमालयी रेंज का तीन हजार किमी क्षेत्र देश में है, जिसका अधिकांश भाग नेपाल और चीन सीमा से जुड़ा है। चाइना बॉर्डर रोड के निर्माण में तेजी लाना हमारी प्राथमिकता है, ताकि सेना को सुविधा मिल सके। 

अल्मोड़ा जिले के दर्जनों अस्पतालों में डॉक्टर नहीं हैं और ये फॉर्मासिस्टों के सहारे चल रहे हैं. जिला मुख्यालय के अस्पतालों में भी डॉक्टरों और विशेषज्ञों की भारी कमी हैं इसकी वजह से मरीजों को निजी अस्पतालों या फिर मैदानी क्षेत्रों का रुख करना पड़ता है.

डॉक्टरों की कमी पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच जंग छिड़ गई है और दोनो पार्टियों के नेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं.

केन्द्रीय राज्य मंत्री अजय टम्टा का कहना है कि राज्य में पहले स्वास्थ्य की स्थिति ठीक नहीं थी क्योंकि राज्य में डॉक्टरों की भारी कमी रही है. अब राज्य सरकार डॉक्टरों की कमी दूर करने की कोशिश कर रही है.

अजय टम्टा ने दावा किया कि पहले भारी अव्यवस्था थी और डॉक्टर पहाड़ों में नहीं मैदानी क्षेत्रों में ही रहते थे. सरकार डॉक्टरों को पहाड़ की ओर भेजने की पूरी कोशिश कर रही है. एमबीबीएस पास कर बने नए डॉक्टरों को भी पहाड़ों में तैनाती दी जा रही है.


बीजेपी नेता ने यह भी दावा कि अल्मोड़ा, बागेश्वर की डिस्ट्रिक्ट मॉनीटरिंग कमेटी की बैठक में उन्हें पता चला है कि दोनों ज़िलों में डॉक्टरों की संख्या पहले के मुकाबले कुछ बढ़ी है.

लेकिन कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं. वह कहते हैं कि ज़िला मुख्यालय तक में एक या दो डॉक्टर ही हैं, अगर वह छुट्टी पर चले जाते हैं तो व्यवस्था चौपट हो जाती है.

कांग्रेस सांसद के अनुसार यह विडंबना ही है कि चार धाम यात्रा मार्ग पर मुख्यमंत्री हर एक किलोमीटर पर एक डॉक्टर होने का दावा कर रहे हैं लेकिन राज्य के ज़िला मुख्यालयों तक में डॉक्टर नहीं हैं.

भ्रष्टाचार के विरोध, भ्रष्टचार की कमर तोड़ने की बातें उत्तराखंड जुमलेबाज़ी ज़्यादा नज़र आती हैं. ज्यादातर मंत्रियो और विधायकों ने तो सम्पत्ति का ब्यौरा नहीं दिया तो अधिकारी क्यों पीछे रहें. आरटीआई से मिली जानकरी के मुताबिक राज्य के 101 पीसीएस अधिकारियों ने संपत्ति का ब्यौरा नहीं दिया है.

उत्तराखंड सरकार के पारदर्शिता और ज़ीरो टॉलरेंस के दावे आकड़ों की ज़मीन पर हवा हो रहे हैं. कोई नई पहल करना तो दूर राज्य सरकार पारदर्शिता और भ्रष्टाचार नियंत्रण के लिए पहले से लागू नियमों का ही पालन नहीं करा पा रही है.

आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक उत्तराखंड के अधिकतर पीसीएस अधिकारियों ने अपना सम्पत्ति का ब्यौरा नहीं दिया है. काशीपुर निवासी आरटीआई कार्यकर्ता नदीम उद्दीन ने अधिकारियों के सम्पत्ति विवरण सम्बन्धी सूचना मांगी थी. उन्हें बताया गया कि राज्य के अधिकतर PCS अधिकारियों द्वारा वार्षिक सम्पत्ति का ब्यौरा न देने का चैंकाने वाला खुलासा हुआ है.

आरटीआई के अनुसार सिर्फ़ 30 PCS अधिकारियों ने ही अपनी सम्पत्ति का विवरण दिया है. 101 PCS अधिकारी ऐसे हैं जिन्होंने 28 मार्च, 2018 तक अपना सम्पत्ति विवरण नहीं दिया था. सम्पत्ति का ब्यौरा न देने वालों में वह अधिकारी भी शामिल हैं जिनका नाम एनएच 74 घोटाले है.


वरिष्ठ पत्रकार एसएमए काज़मी कहते हैं कि अगर सारे अधिकारी और विधायक अपनी सम्पति का ब्यौरा समय पर दे देंगे तो इससे सिस्टम में पारदर्शिता आएगी.

भाजपा के देवप्रयाग के विधायक विनोद कंडारी कहते हैं जब सरकार का नियम है कि सम्पति का ब्यौरा समय पर दें तो सभी को सम्पति का ब्यौरा दे देना चाहिए. मंत्रियों और विधायकों के साथ ही सरकारी अधिकारियों को भी अपनी सम्पति का ब्यौरा दे देना चाहिए.

ज्वालापुर I आर्य समाज के ज्वालापुर स्थित गुरुकुल के 111 वें वार्षिकोत्सव में पूर्व सीएम हरीश रावत, विधानसभा अध्यक्ष प्रेम चंद्र अग्रवाल और हरिद्वार ग्रामीण से विधायक स्वामी यतीश्वरानंद शामिल हुए. इस दौरान आर्य जगत के दूर दराज से आए विद्वानों ने अपने विचार रखे और संस्था के अग्रणीय योगदान पर प्रकाश डाला. वहीं विधानसभा अध्यक्ष ने उपनल में भर्ती हुए बेटे के इस्तीफे पर अपनी पीड़ा व्यक्त की.

विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि जिस तरह से उन्हें इस पूरे प्रकरण में घेरने की कोशिश की गई वो ठीक नहीं. उन्होंने कहा कि अगर किसी में योग्यता है तो उसको वंचित किया जाना वह ठीक नहीं समझते. करीब 25 हजार लोगों की उपनल के जरिए भर्ती हुई है. उन्होंने कहा कि यदि पात्रता की ही बात है तो करीब 20 हजार ऐसे लोग हैं जो सैनिक परिवारों से नहीं हैं. ये सरकार को तय करना है और जो लोग विरोध कर रहे थे वो खुद इस बात को तय करें तो बेहतर होगा. जाहिर है कि गुरुकुल के वार्षिकोत्सव के मौके पर भी बेटे के नौकरी से इस्तीफे का मलाल विधानसभा अध्यक्ष को अभी भी सताए हुए है.

विधानसभा अध्यक्ष ने आगे कहा कि 111 वर्षों के इतिहास में गुरुकुल का अपना स्वर्णिम स्थान रहा है. हजारों हजार हमारे छात्र यहां से निकलकर विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं. मैं उन सभी बच्चों को बधाई देने के लिए यहां आया हूं. पूर्व सीएम हरीश रावत ने कहा कि ये शिक्षण संस्था अपने आप में अद्भुत है. इस पवित्र भूमि से देश को कई राष्ट्रनायक कर्मवीर मिले हैं. उन्होंने कहा कि वह यहां तीसरी बार अए हैं. हर बार यहां आने के बाद उन्हें नए-पन की अनुभूति होती है.

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मसूरी में जायका की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में शिरकत की.  कार्यशाला में वन मंत्री डॉक्टर हरक सिंह रावत विधायक गणेश जोशी और विधायक मुन्ना सिंह चौहान भी शामिल हुए. इस राष्ट्रीय कार्यशाला में देश के तेरह राज्यों के प्रतिनिधि और जापान का आठ सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल शिरकत कर रहा है.

कार्यशाला को संबोधित करते हुए सीएम त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि जायका प्रोजेक्ट में 8 सौ करोड़ रुपये उत्तराखंड को मिले हैं. इससे उत्तराखंड के जंगल, भूस्खलन प्रभावित क्षेत्र का ट्रीटमेंट किया जाएगा. कोशिश की जाएगी कि महिलाओं की आमदनी बढ़ाई जाए. इसके साथ ही वन पंचायतों को मजबूत किया जाएगा.

वन मंत्री डॉक्टर हरक सिंह रावत ने जापान सरकार का आभार जताया. उन्होंने कहा कि जायका प्रोजेक्ट के माध्यम से लोगों की आमदारी कैसे बढ़े इस दिशा में काम किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि भूस्खलन प्रभावित क्षेत्र जैसे सिरोबगड़, उत्तरकाशी के वरुणाव्रत पर्वत के ट्रीटमेंट में जापान की तकनीकी सहायता ली जाएगी.

विधायक गणेश जोशी ने कहा कि जायका के माध्यम से सरकार ने हजारों लोगों को रोज़गार देने का काम किया है.

विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल के पुत्र की उपनल के माध्यम से हुई ऐसा पहला या अकेला मामला नहीं है जिसमें सैनिक या सैनिक आश्रित न होने के बावजूद किसी को नियुक्ति मिली हो. दरअसल, सत्ता जिसकी भी हो, रसूखदारों के लिए उपनल के माध्यम से ही चोर-रास्ता बनाया जाता रहा है. साल 2016 में नियमों को ताक पर रखते हुए उपनल के ज़रिए ही 158 लोगों को विधानसभा सचिवालय में तदर्थ नियुक्ति दे दी गई थी. शिकायतें हुई, बवाल हुआ लेकिन रिज़ल्ट आज तक भी कुछ नहीं निकला. उपनल के जरिए दस हज़ार की नौकरी करने वाले लोग आज 40 हज़ार से लेकर 75 हज़ार तक की तनख्वाह पा रहे हैं.

राज्य पूर्व सैनिक कल्याण निगम लिमिटेड यानि उपनल राज्य में राजनेताओं के लिए स्वार्थ पूर्ति का एक साधन मात्र बनकर रह गया. 2016 में चार जनवरी को विधानसभा चुनाव की आचार संहिता लगने से पहले 16, 19 और 22 दिसंबर को उत्तराखंड विधानसभा में बैकडोर से ताबड़तोड़ 158 लोगों को तदर्थ नियुक्तियां दे दी गई थीं. NEWS 18 के पास इस पूरे मामले के प्रमाण मौजूद हैं. इनमें नब्बे फीसदी लोग तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष से लेकर नेताओं के नाते-रिश्तेदार हैं.

देखते हैं यह हुआ कैसे था?



  • यह भर्तियां इस तथ्य के बावजूद की गईं कि उत्तराखंड में 2003 से तदर्थ नियुक्तियों पर पूरी तरह रोक है. यदि विशेष परिस्थितियों में करनी ही पड़ें तो इसके लिए कैबिनेट के साथ ही कार्मिक विभाग की मंजूरी लेनी होगी. लेकिन 2016 में इन नियमों का पालन नहीं किया गया.

  • सुप्रीम कोर्ट की गाइडलान के बावजूद इन भर्तियों के लिए किसी प्रकार का विज्ञापन प्रकाशित नहीं किया गया.

  • उपनल में कुमाऊं मंडल के बेरोजगारों का हल्द्वानी में और गढ़वाल मंडल के बेरोजगारों का देहरादून में रजिस्ट्रेशन होता है. लेकिन, विधानसभा में हुई इन नियुक्तियों में सारे रजिस्ट्रेशन देहरादून कार्यालय में हुए.

  • 4 जुलाई, 2016 को सचिव समिति ने निर्णय लिया था कि कोई भी गैर सैनिक आश्रित उपनल के माध्यम से भर्ती नहीं किया जाएगा.

  • 25 मई 2012 को कैबिनेट ने निर्णय लिया था कि सभी प्रकार की भर्तियों में क्षैतिज और लंबवत आरक्षण लागू होगा. लेकिन, विधानसभा सचिवालय ने इस नियम को भी दरकिनार कर दिया.

  • विधानसभा में रक्षक पद पर 44 भर्तियां की गई, इनके लिए शारीरिक परीक्षण ज़रूरी है, लेकिन किसी भी अभ्यर्थी का शारीरिक परीक्षण नहीं कराया गया.

  • छठे वेतन आयोग के बाद 2006 में चतुर्थ श्रेणी पदों को डेथ कैडर मानते हुए व्यवस्था की गई कि ये सभी पद आउटसोर्स से भरे जाएंगे. उत्तराखंड विधानसभा में चतुर्थ श्रेणी के 17 पद हैं, इनके विपरीत 23 लोग सीधी भर्ती से अंदर कर लिए गए. ऐसे में पदों के विपरीत छह लोग पिछले डेढ़ साल से बिना पद के तनख्वाह ले रहे हैँ. इसमें वित्त विभाग भी सवाल के घेरे में है.


बड़ा सवाल तो यह उठता है कि आखिर ऐसा हो कैसे गया. दरअसल नियुक्तियों में तब तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष से लेकर कई विधायक और मंत्रियों के रिश्तेदार शामिल थे जिन्हें रातों-रात महत्वपूर्ण पदों पर नौकरियां दे दी गई थीं.

एक नज़र नियमों को ताक पर रखकर की गई अंधाधुंध नियुक्तियों परः


  • तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल के बेटे पंकज कुंजवाल को क्लास टू श्रेणी में विधानसभा रिपोर्टर के पद पर नियुक्ति दे दी गई. इस पद के लिए अंग्रेजी और हिंदी में शॉर्ट हैंड अनिवार्य है लेकिन, पंकज कुंजवाल को शॉर्ट हैंड आती ही नहीं है.

  • कुंजवाल की बहु स्वाति कुंजवाल को भी 5400 ग्रेड पे पर उप प्रोटोकॉल अधिकारी में तदर्थ नियुक्ति दे दी गई.

  • कुंजवाल के भतीजे स्वपनिल कुंजवाल को सहायक समीक्षा अधिकारी के पद पर नियुक्ति दे दी गई.

  • विधायक हरीश धामी के भाई खजान धामी को विधानसभा रिपोर्टर के पद पर नियुक्ति दे दी गई. खजान धामी को भी शॉर्ट हैंड का ज्ञान नहीं है.

  • विधायक हरीश धामी की बहू यानि कि खजान धामी की पत्नी लक्ष्मी चिराल को भी सहायक समीक्षा अधिकारी बना दिया गया.

  • तत्कालीन कैबिनेट मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी की पुत्री मोनिका को भी अपर सचिव पद पर तैनाती दे दी गई.

  • पूर्व सीएम भुवनचंद्र खंडूरी के ओएसडी रहे जयदीप रावत की पत्नी सुमित्रा रावत को भी विधानसभा में नियुक्ति दे दी गई.


अंधेरगर्दी यह रही कि इन 158 लोगों ने नौकरी के लिए सादे पेपर पर आवेदन किया और एक भी आवेदन पत्र में आवेदन करने की तिथि तक अंकित नहीं है. सवाल यह कि क्या 158 में से सभी अभ्यर्थी आवेदन पत्र में आवेदन करने की तिथि लिखना भूल गए.

कुंजवाल के बाद विधानसभा अध्यक्ष बने प्रेमचंद अग्रवाल ने इस पूरे मामले पर जांच की बात कही थी, लेकिन कुछ दिनों बाद अग्रवाल भी खामेाश हो गए. नियुक्ति अधिकारी विधानसभा सचिव कुछ भी बोलने को तैयार नहीं. ज़ाहिर है यह ख़ामोशी बहुत सारे सवालों को जवाब देती है और बहुत सारी अफ़वाहों को भी.

नगर निकाय चुनाव को लेकर चल रहे टकराव के बीच सरकार ने राज्य निर्वाचन आयोग को कार्यक्रम भेज दिया है. सरकार ने राज्य निर्वाचन आयोग से चुनाव के लिए 13 मई के बाद की कोई तिथि तय करने की गुजारिश की है. 23 नगर निकायों में सीमा विस्तार नए सिरे से करने के बाद सरकार ने परिसीमन और आरक्षण को लेकर कार्यक्रम तय कर लिया है. सरकार ने राज्य निर्वाचन आयोग को कार्यक्रम भेज दिया है.

सरकार ने सभी जिलाधिकारियों को ये कार्यक्रम भेजकर इसके अनुरूप कार्यवाही के लिए कहा है. इधर 11 अप्रैल को चुनाव को लेकर हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई के लिए सरकार प्रति शपथ तैयार करने भी में जुटी है. सरकार को 9 अप्रैल तक यह प्रति शपथ हाईकोर्ट में जमा करना है.

नगर निकाय चुनाव को लेकर राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य सरकार के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है. मामला फिल्हाल हाईकोर्ट में विचाराधीन है. आयोग की अधिसूचना जारी होते ही चुनाव की आचार संहिता लागू हो जाएगी.

राज्य निर्वाचन आयोग को सरकार द्वारा भेजा गया कार्यक्रम-

  • 9 अप्रैल को 23 निकायों के कक्षों का परिसीमन प्रस्ताव जिलाधिकारी भेजेंगे.

  • 11 अप्रैल को शासन परिसीमन की अंतिम सूचना प्रकाशित करेगा.

  • 11 से 17 अप्रैल तक जिला स्तर पर परिसीमन पर आपत्तियां मांगी जाएंगी.

  • 18 से 20 अप्रैल तक जिले में परिसीमन पर आपत्तियों पर सुनवाई होगी.

  • 21 से 22 अप्रैल तक जिलाधिकारी स्तर से शहरी विकास निदेशालय को संस्तुति देंगे.

  • 23 अप्रैल को परिसीमन पर अंतिम अधिसूचना का प्रकाशन की जाएगी.

  • 24 से 26 अप्रैल तक मेयर और अध्यक्षों पद पर आरक्षण की रिपोर्ट जिलाधिकारी देंगे.

  • 27 अप्रैल को परिसीमन की अंतिम अधिसूचना जारी होगी.

  • 28 अप्रैल से 4 मई तक आरक्षण पर आपत्तियों के लिए अंतिम अधिसूचना जारी होगी.

  • 5 से 6 मई वार्डों की जिला और मेयर, अध्यक्ष के आरक्षण पर प्रशासन में सुनवाई होगी.

  • 7 से 9 मई तक सुनवाई के बाद जिलाधिकारी  निर्देशालय और शासन को सूचना देंगे.

  •  12 मई को कक्षों और मेयर, अध्यक्षों के आरक्षण की अंतिम अधिसूचना जारी होगी.

उत्तराखंड वाटर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट को केंद्र ने 910 करोड़ की सैद्धांतिक सहमति दे दी है. केन्द्र से यह पैसा मिलने से न सिर्फ प्रदेश की असिंचित भूमि में सिंचाई संभव हो पाएगी बल्कि राज्य के खाद्यान्न भंडार में वृद्धि होगी होगी और कृषि उद्यान की कई योजनाएं भी हकीकत बन सकेंगी.

राज्य के हर खेत तक पानी पहुंचाने के लिए सिंचाई विभाग ने उत्तराखंड वाटर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट तैयार किया है. 910 करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट को केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने सैद्धांतिक रूप से सहमति प्रदान कर दी है. विश्व बैंक की मदद से संचालित होने वाले इस प्रोजेक्ट में केंद्र और राज्य का हिस्सा  90:10 के अनुपात में होगा राज्य में सिंचाई के तीन प्रमुख संसाधनों में नहरें, नलकूप और पंप नहरें हैं.

प्रमुख सचिव सिंचाई आनंद वर्द्धन ने गर्मियों के मद्देनज़र सिंचाई सुविधाओं को बेहतर करने के लिए ग्रांउड जीरो पर वर्क करने वाले कर्मचारीयो को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं.

राज्य में खेती भूमि 7.142 लाख हैक्टेयर है जिसके अनुपात में सिंचित क्षेत्रफल महज 3.394 लाख हेक्टेयर ही है. यानि प्रदेश में 3.748 लाख हैक्टेयर खेती भूमि असिंचित है. इसी असिंचित खेती की ज़मीन तक पानी पहुंचाने के लिए सिंचाई विभाग ने उत्तराखंड वाटर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट तैयार किया गया है.


इस प्रोजेक्ट के तहत प्रदेश में नए बैराज,पंप नहरें बनाई जाएंगी और ट्यूबेल भी लगेंगे. इसके लिए विश्व बैंक के अधिकारी फील्ड विजिट कर इसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट डीपीआर तैयार करेंगे ताकि इस प्रोजेक्ट के तहत प्रदेश में जल संरक्षण और संवर्धन को बढ़ावा दिया जा सके.

केन्द्र से सैद्वांतिक स्वीकृति के बाद अब देखना होगा कि विभागीय तंत्र इसका कितना सदुपयोग कर पाएगा.

 

राज्यपाल के अभिभाषण के साथ ही गैरसैंण में बजट सत्र का आगाज हो चुका है. 22 मार्च को सदन के पटल पर वित्त मंत्री वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिए बजट पेश करेंगे. बजट राज्य में आधारभूत ढांचे के विकास का भी आधार रखता है. इसी आधारभूत ढांचे को तैयार करने, विस्तार देने में लोक निर्माण विभाग की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. आइए बताते हैं कि इस साल के विभाग के बजट में क्या ख़ास है और इस बजट से राज्य के आधारभूत ढांचे को कैसे मजबूत किया जाएगा.

सड़कें राज्य के विकास में रीढ़ का काम करती हैं. इसलिए शहर से लेकर गांव तक सड़कों का जिम्मा संभाले PWD की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. विषम भौगोलिक परिस्थितियां कहें या विभाग के काम की धीमी रप्तार बीते सालों में विभाग को जितना बजट मिला, विभाग उतना खर्च ही नहीं कर पाया.

साल 2016-17 में PWD को 2105 करोड़ का बजट मिला था, जिसमें से विभाग 1976 करोड़ ही खर्च कर पाया. इसी तरह वर्ष 2017-18 में 2231 करोड़ विभाग को मिले, जिसमें से फरवरी तक विभाग 1775 करोड़ रुपये ही खर्च कर पाया था. हालांकि, विभाग का दावा है कि मार्च तक पूरा बजट खर्च करने के बाद देनदारियों को पूरा करने के लिए उसे 120 करोड़ की और आवश्यकता होगी. इसलिए विभाग ने इस वर्ष करीब 3000 करोड़ रुपये के बजट का प्रस्ताव तैयार किया है.

एक नजर वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिए प्रस्तावित बजट में लोनिवि के कुछ मुख्य टारगेट परः


-ऑल वेदर रोड परियोजना के अंतर्गत सभी 22 परियोजनाओं को उच्च प्राथमिकता में पूरा करने का लक्ष्य है.

- केदारनाथ पुनर्निर्माण कार्य भी विभाग की उच्च प्राथमिकताओं में है.

- विभाग का लक्ष्य होगा कि देहरादून शहर में निर्माणाधीन मोहकमपुर, अजबपुर और आईएसबीटी ओवरब्रिज का निर्माण इस वित्तीय वर्ष में पूरा कर लिया जाए.

- स्टेट हाइवे सुधारीकरण कार्य समेत करीब चार हजार करोड़ के कार्यों को नाबार्ड और ADB वित्त पोषित योजनाओं से संपन्न किया जाएगा.

-  1107 किलोमीटर लंबाई में नई सड़कों का निर्माण और 1048 किलोमीटर सड़कों का पुर्निनर्माण और सुधारीकरण कार्य का भी लक्ष्य है.

-  इस वर्ष 131 नए सेतुओं का निर्माण किया जेगा और 170 गावों को सड़क मार्ग से जोड़ा जाएगा.

बीते वर्ष पर यदि नजर डालें तो लोक निर्माण विभाग 2017-18 के अपने लक्ष्यों को पूरा करने में भी करीब-करीब सफल रहा है.

- 2017-18 में 190 मीटर लंबाई में डबल लेन श्रीनगर चौरास पुल, रुड़की में गंगनहर पर पुल निर्माण को पूरा करवाने में विभाग सफल रहा है.

- टिहरी झील के ऊपर 440 मीटर लंबा डोबरा चांटी पुल का निर्माण कार्य प्रगति पर है.

- ऑल वेदर रोड के स्वीकृति सभी 22 परियोजनाओं पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया है.

-  दिल्ली-देहरादून हाईवे पर डाट काली टनल का कार्य अंतिम चरण में है.

-  मुनि की रेती में गंगा नदी पर 310 मीटर लंबे पैदल पुल के निर्माण कार्य में विभाग को जरूर अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई. इस पुल का रिवाइज़्ड एस्टिमेट शासन को भेजा गया है.
नई दिल्ली I लोकसभा चुनावों में एनडीए गठबंधन का सबसे बड़ा दल था और उसे भारतीय जनता पार्टी अकेले बहुमत से ज्यादा सीटें मिली थीं. अब आगामी आम चुनाव से एक साल पहले मोदी सरकार की पहली बड़ी परीक्षा होने वाली है.

एनडीए के सहयोगी दल बीजेपी से नाराज चल रहे हैं और अब वे सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करने वाले हैं. ये दल टीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस हैं. ये दोनों दल आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने मुद्दे पर सोमवार को केंद्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करेंगे.

वाईएसआर कांग्रेस के सांसद वाईवी सुब्बा रेड्डी ने अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस को सोमवार की कार्यवाही में शामिल करने के लिए लोकसभा सचिवालय को लिखा है. टीडीपी ने भी अविश्वास प्रस्ताव के लिए नोटिस दिया हुआ है. इससे पहले शुक्रवार को ये दोनों पार्टियां अविश्वास प्रस्ताव लाना चाहती थीं, लेकिन यह पेश नहीं हो सका था. इसके लिए संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार ने तर्क दिया था कि सदन में अव्यवस्था की स्थिति में अध्यक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव खारिज कर दिया था.

आपको बता दें कि शुक्रवार को टीआरएस, एआईएडीएमके समेत अन्य पार्टियां कई मुद्दों पर सदन के वेल में आकर हंगामा कर रही थीं. हालांकि सोमवार को भी सदन व्यवस्थित रहेगा या नहीं, इसके बारे में अभी से कुछ नहीं कहा जा सकता है. बजट सत्र की शुरुआत से ही ये दल सदन में विरोध कर रहे हैं.
वाईएसआर कांग्रेस ने अविश्वास प्रस्ताव दिया है. वहीं, आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ टीडीपी भी इस मामले पर वाईएसआर के साथ आ गई है . आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू एनडीए से दोस्ती तोड़ने का ऐलान कर चुके हैं. उनके दो मंत्री कैबिनेट से इस्तीफा भी दे चुके हैं.
ऋषिकेश। बुधवार को स्वच्छता एवं स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता को एम्स ऋषिकेश के चिकित्सक एवं छात्रों ने साइकिल रैली निकाली। रैली एम्स परिसर से त्रिवेणी घाट पर पहुंचकर खत्म हुई। रैली का शुभारंभ एम्स निदेशक प्रो.रविकांत ने झंडी दिखाकर किया। साइकिल रैली का उद्देश्य समाज में बढ़ रही डाइबिटीज़, ब्लडप्रेसर एवं हृदय रोगों से बचाव एवं जागरूकता फैलाना था। नेशनल मेडिकल संस्थान के सदस्यों एवं छात्रों ने सामाजिक जागरूकता स्वास्थ्य सेवा राष्ट्र सेवा के लिए इस रैली का आयोजन किया था। रैली एम्स परिसर से शुरू होकर बैराज मार्ग, हरिद्वार मार्ग, घाट मार्ग होकर त्रिवेणीघाट पर खत्म हुई। रैली में प्रोफेसर मनोज कुमार गुप्ता, प्रोफेसर बिजेन्द्र सिंह, डॉ केएस रवि एवं डॉ संतोष कुमार एवं उनकी टीम ने त्रिवेणी घाट पर रोगियों एवं उपस्थित लोगों का स्वास्थ्य परीक्षण किया। इसमें ब्लडप्रेसर के मरीज ज्यादा पाए गए।